Old Testament
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Reader-friendly overview
यो प्रवचन मत्ती 18:28 में दास के बारे में एक चेतावनी देता है कि माफ़ी मिलने के बाद भी हमारे विश्वास में दया और करुणा के कार्य कैसे प्रकट होने चाहिए। दया की सीमा तब नहीं होनी चाहिए जब हमें क्षमा दिया गया हो, बल्कि उसे दिखाने के लिए ही हमें माफी के बाद भी दूसरों के साथ उदार व्यवहार करना चाहिए। यह वचन मसीही समाज में दया और दयालुता की सच्ची मूरत और निर्देश देती है कि कैसे पाप के प्रति दया में हम दूसरों के प्रति व्यवहार करें।
Verse-centered discussion
पद का पाठ स्पष्ट करता है कि दास को उसके एक साथी दास पर कितना अधिक कर्ज़ था—यह 100 धीना नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ा रिश्ता नहीं, लेकिन समाज के मानक के अनुसार वह दास अभी भी एक कष्टदायक ऋणी है। जब वह अपने साहब के सामने से बाहर निकलता है, तब उसी दास के पास जो धन एक बार चुकता जा सकता था, उसे सम्मानपूर्वक या विनयपूर्वक चुकाने को कहा गया होगा। लेकिन इस दास ने आगे क्या किया—उसने अपने सहदास को पकड़ लिया, उसका गला घोंटा और कहा कि उसे उस कर्ज को भरना होगा। इस दृश्य से यह स्पष्ट होता है कि दया और क्षमा के माहौल में भी एक आसक्ति और क्रूरता का व्यवहार हो सकता है, जो उस क्षमा के उद्देश्य के विरुद्ध है।
Main spiritual lesson
Relevant cross-references (brief explanations)
1) मत्ती 6:14-15 — क्षमा करने की जरूरत पर जोर देता है; जैसे प्रभु ने हमारे अपराध माफ किए, वैसे ही हमें भी दूसरों को क्षमा करना चाहिए।
2) लूका 6:36 — दयालु बनो, जैसे तुम्हारा पिता दयालु है; दयालुता और क्षमा का अगला चरण व्यवहार में दिखना चाहिए।
3) मरकुस 11:25 — प्रार्थना में क्षमा करने के साथ ही प्रार्थना का प्रभाव प्राप्त होता है, जब हम दूसरों के विरुद्ध दिल से क्षमा करते हैं।
Careful application
- स्मरण रखें कि माफ़ी एक आंतरिक परिवर्तन है, न कि केवल बाहरी नियम। जब हम दूसरों के ऋणों और कमियों के लिए उदार रहते हैं, तो हम मसीह की दया का अनुकरण कर रहे होते हैं।
- कठिन क्षमाओं के समय प्रार्थना करें ताकि दिल मुक्त हो और दया का रास्ता खुल सके; क्योंकि क्रोध और दबाव से बंधे आचरण ईश्वर کی इच्छा से दूर होते हैं।
Summary
पद 28 से स्पष्ट होता है कि दया के अनुभव के बाद भी हमारी दुनिया में क्षमा, दया और करुणा का व्यवहार कायम रहना चाहिए। एक दास के द्वारा दिखाया गया क्रूर व्यवहार इस बात की चेतावनी है कि क्षमा और दया के संदेश के साथ-साथ हमें दूसरों को भी उसी माप से माफ़ करना चाहिए जिसका हमने पाया है। यही प्रभु की सीख है, जिसे Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के अभिकल्पों के भीतर भी सार्थक रूप से समाहित किया गया है — क्षमा मिलना है, और क्षमा देना उसका आचरण है।