Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
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मत्ती 18:33 का संदेह-सुधार: दया से दया
पद्य का संदर्भ एक दास के अपराध के बाद मंत्री-शासन का बड़ा पाठ प्रस्तुत करता है। यहाँ प्रभु यीशु अपने शिष्यों के द्वारा एक दास के प्रति दयालुतापूर्ण व्यवहार पर जोर देते हैं, ताकि रिश्ता और जिम्मेदारी स्पष्ट रहे। जब एक सेवक का अपराध होता है, तो उसके मालिक को उसकी दया और क्षमा जैसी नीति से प्रेरित होना चाहिए, और यही दृष्टि न्याय के साथ प्रेम की संतुलित भूमिका है।
केंद्रीय अर्थ
इस पद में मसीही नेता, जो अपने सेवकों के प्रति दयालु होता है, उसे अपने साथ जुड़ी हुई नैतिक माँगों को याद रखना चाहिए। एक दयालु राजा जैसे रूप में प्रभु यीशु कह रहे हैं कि यदि उनमें दया है, तो वे भी अपने दासों के प्रति वैसी दया दिखाने के लिये बाध्य हैं। यह उत्तरदायित्व–सूत्र न्याय और दया के बीच संतुलन बनाये रखने की भी याद दिलाता है।
दो-तीन मुख्य विषय
related passages (संयोगपूर्ण संदर्भ)
- मत्ती 6:14-15: व्यवहार में क्षमा की नीति का महत्व।
- मत्ती 7:12: जो कुछ तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे लिए करें, वही तुम भी उनके लिये करो—करुणा और समभाव की नैतिक धारा।
- लूका 6:36: दयालु बनो, जैसा तुम्हारा पिता दयालु है—न्याय के साथ प्रेम की दया।
व्यावहारिक विचार
जीवन में छोटे-छोटे विवादों में यह सीख काम आती है कि माफी और उदारता व्यक्तियों के बीच विश्वास बनाती है। यदि हम अपने संगी दास के प्रति दया दिखाते हैं, तो हम समुदाय के भीतर ईमानदारी, सुरक्षा और सहयोग की स्थापना करते हैं। यह केवल व्यक्तिगत व्यवहार नहीं, समुदाय की स्वास्थ्यपूर्ण गतिशीलता है।
सारांश
इस वाक्य से स्पष्ट होता है कि दया एक कार्य है, न कि केवल विचार। प्रभु यीशु हमें स्मरण कराते हैं कि जितनी हमारी क्षमा और दया बड़ी होती है, उतनी ही हमारी जवाबदेही भी गहन होनी चाहिए—हम भी अपने दासों और साथियों के प्रति वैसी दया दिखाने योग्य हैं, जैसी उसने हमारे लिए दिखाई है।
मूल पाठ से उद्धरण
Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन विचारों का एक सामान्य सार इस क्रम को मजबूत करता है: दया को कार्रवाई बनना चाहिए, न कि केवल दर्शन; तथा दया–न्याय की संतुलन वह आधार है जिस पर समाज-व्यवस्था चलती है।