भजन संहिता 117:1 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

हे जाति-जाति के सब लोगों, यहोवा की स्तुति करो! हे राज्य-राज्य के सब लोगों, उसकी प्रशंसा करो! (रोम. 15:11)

भजन संहिता 117:1 पद-दर-पद बाइबल टीका

भजन संहिता 117:1 पर टिप्पणी

यह छोटा भजनभरोसा संसार की हर जाति और हर समुदाय के लिए एक सार्वभौमिक बुलावा है। भावार्थ यह है कि ईश्वर की महिमा और कृपा के कारण सभी नर-नारी, कुल-जाति एक ही धुन में उसकी स्तुति करें। भजन लेखक यहाँ परमेश्वर की अनुग्रह-प्रसाद को विश्वभर में फैलाने की प्रेरणा दे रहा है, कि भीतर की परिवर्तनकारी अनुभूति बाहरी उत्सव और गीतों के रूप में प्रकट हो। संदर्भ में यह भजन परमेश्वर की महान करुणा और न्याय की एक सहज से भरी घोषणा है, जो सभी लोगों के लिए खुला है।

मुख्य अर्थ

यह भजन प्रभु की स्तुति के लिए समस्त जातियों‑राष्ट्रों को एक संग लाने का आह्वान है। परमेश्वर की करुणा और सत्य-प्रतिज्ञा के कारण सभी लोग उसकी महिमा proclaim करें—यह पूजा का सार्वभौमिक संकेत है। “यहोवा की स्तुति करो” का आह्वान मानवजाति के हर हिस्से को एक कारण पर एकत्रित करता है: उसकी दयालुता और वाचा, जो सभी पर समान रूप से प्रकट होती है।

दो-तीन प्रमुख विषय

  • सार्वभौमिक आह्वान: सभी जातियाँ और सभी देशों के लोग ईश्वर की स्तुति करें।
  • धर्मीय एकता का संकेत: एक जैसा लक्ष्य—ईश्वर की महिमा—सब मिलकर शांति से गाएं।
  • राज्य-राज्य शब्दावली का उपयोग: प्रभुत्व और कीर्ति का केन्द्र ईश्वर है; सारी सत्ता और सम्मान उसी के लिए है।

संबद्ध संदर्भ और उनकी संक्षिप्त व्याख्या

• रोम 15:11 में दिखता है कि पवित्रशास्त्र के कुछ भागाने स्थानीय सीमा से बाहर निकलकर सभी लोगों के बीच मिलाप की पुकार को प्रतिध्वनित करते हैं—यह समानता और आपसी सम्मान की मांग है।
• भजन संहिता 96:4‑5 जैसे अध्याय भी सभ्यता के विविध देवताओं के विरुद्ध Yahweh की विशिष्टता और भक्ति की महिमा को केंद्रित करते हैं, जिसका प्रभाव इस 117वें भजन में भी दिखता है।
• स्तोत्र 100:3‑5 में ईश्वर की ममता, वाचा और सत्य के कारण उन सभी को आशीर्वाद मिलता है—यही दया समस्त राष्ट्रों के लिए खुली है।

व्यावहारिक विचार

हम में से हर व्यक्ति—चाहे वह किसी भी भाषा, जाति, या पृष्ठभूमि से हो—परमेश्वर की स्तुति के समान भागीदार बन सकता है। यह verse प्रेरणा देती है कि समुदाय में विविधता के बीच एकता कैसे पनपे: एक ईश्वर, एक धुन, एक लक्ष्य। हमारी पूजा में बाह्य रीति-रिवाज के साथ-साथ दयाभाव, सत्य और मिलन की इच्छा भी शामिल होनी चाहिए।

एक संक्षिप्त समापन

भजन 117:1 एक सरल, पर गूढ़ बुलावा है—हर जाति और हर देश के लिए परमेश्वर की महिमा का गीत। यह संदेश आज भी प्रासंगिक है: प्रभु की स्तुति से हम एक साथ आते हैं, उसकी करुणा और शासन को मानते हैं, और एक वैश्विक समुदाय बनाते हैं जो उसकी महिमा में एक साथ गाता है।

कथन-नोट

इस टिप्पणी में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के जुड़े-आइडिया के स्रोत के तौर पर उनके सार्वजनिक-डोमेन विचारों से संक्षिप्त प्रेरणा सम्मिलित की गई है; नीचे उनके नामित उद्धरण स्पष्ट रूप से उद्धृत नहीं हैं, पर उनके संयुक्त प्रभाव का समेकन यहाँ प्रयत्नपूर्वक किया गया है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

भजन संहिता 117:1 समानांतर पद और संबंधित वचन

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और फिर, “हे जाति-जाति के सब लोगों, प्रभु की स्तुति करो; और हे राज्य-राज्य के सब लोगों; उसकी स्तुति करो।” (भज. 117:1)

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“हे प्रभु, कौन तुझ से न डरेगा? और तेरे नाम की महिमा न करेगा? क्योंकि केवल तू ही पवित्र है, और सारी जातियाँ आकर तेरे सामने दण्डवत् करेंगी, क्योंकि तेरे न्याय के काम प्रगट हो गए हैं।” (भज. 86:9, यिर्म. 10:7, मला. 1:11)

प्रकाशितवाक्य 5:9 HINIRV संबंधित बाइबल पद का चित्र
प्रकाशितवाक्य 5:9 (HINIRV) »
और वे यह नया गीत गाने लगे, “तू इस पुस्तक के लेने, और उसकी मुहरें खोलने के योग्य है; क्योंकि तूने वध होकर अपने लहू से हर एक कुल, और भाषा, और लोग, और जाति में से परमेश्‍वर के लिये लोगों को मोल लिया है। (प्रका. 5:12)

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