Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीरोमियों 13:2 बाइबल पद की व्याख्या
रोमियों 13:2 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
इसलिए जो कोई अधिकार का विरोध करता है, वह परमेश्वर की विधि का विरोध करता है, और विरोध करनेवाले दण्ड पाएँगे।
रोमियों 13:2 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
रोमियों 13:2 समानांतर पद और संबंधित वचन
उन बाइबल पदों को देखें जो विषय, शिक्षा या संदर्भ के आधार पर इस अंश से जुड़े हैं। समानांतर पदों की तुलना करने से इस वचन के संदर्भ और संदेश को अधिक गहराई से समझने में सहायता मिलती है। किसी चित्र को चुनें और संबंधित पद, उसकी व्याख्या तथा पद-दर-पद बाइबल टीका देखें।

1 पतरस 2:13 (HINIRV) »
प्रभु के लिये मनुष्यों के ठहराए हुए हर एक प्रबन्ध के अधीन रहो, राजा के इसलिए कि वह सब पर प्रधान है,

तीतुस 3:1 (HINIRV) »
लोगों को सुधि दिला, कि हाकिमों और अधिकारियों के अधीन रहें, और उनकी आज्ञा मानें, और हर एक अच्छे काम के लिये तैयार रहे,

याकूब 3:1 (HINIRV) »
हे मेरे भाइयों, तुम में से बहुत उपदेशक न बनें, क्योंकि तुम जानते हो, कि हम उपदेशकों का और भी सख्ती से न्याय किया जाएगा।
रोमियों 13:2 के साथ वास्तविक परिदृश्य
पवित्र शास्त्र में रोमियों 13:2 बताता है कि जो कोई शासन के अधिकार के विरुद्ध उठ खड़ा होता है, वह परमेश्वरीय क्रम के विरुद्ध उठता है और इसका दंड उसे भुगतना पड़ता है। इस पाठ का संदर्भ रोम नीति-नियमों के अंतर्गत नीतिगत आचार-व्यवस्था, हिरासत और सब कुछतः सामाजिक व्यवस्था के पालन पर केंद्रित है। प्रेरित पौलुस ने इस संदर्भ में नागरिक के कर्तव्य और प्रशासन के प्रति सम्मान की महत्ता को स्थापित किया है ताकि समाज में शांति और व्यवस्था बनी रहे।
ईश्वर या विश्वास के बारे में जो तथ्य यह प्रकट करता है
यह उपदेश ईश्वर के अधिकार की मान्यता और लोक-प्रशासन के प्रति आस्था का संदेश देता है। परमेश्वर ने प्रशासन को,sorder दिया है ताकि वह नाजायज अव्यवस्था और अपराध पर रोक लगाए। विश्वासियों को यह समझना चाहिए कि कानून का सम्मान करना सीधे ईश्वरीय व्यवस्था का सम्मान है; असहमति के बावजूद भी दायित्व निभाना, विश्वास के वास्तविक जीवन का हिस्सा है।
महत्वपूर्ण शब्दों या चित्रों को स्पष्ट करना
संबंधित पाठ
1) रोमियों 12:17-18 में कहा गया कि अपने विरोधी के साथ भलाई का व्यवहार करें, ताकि बलपूर्वक संघर्ष न बढ़े और शांति बनी रहे।
2) 1 पतरस 2:13-14 में कहा गया है कि हर मान्य व्यवस्था के अनुसार चलना चाहिए, ताकि ईश्वर-परमेश्वर के बंधन को मान्यता मिल सके।
3) त्ती 3:1-2 में विश्वासियों को सरकार के प्रति विनयशील रहने की शिक्षा दी गई है, ताकि आदर्श नैतिकता बनी रहे।
आज के संदर्भ में उपयोग
- समाजिक व्यवस्था पर भरोसा बनाकर, नागरिक दायित्व निभाएं: क़ानून का अनुपालन, चुनाव में भागीदारी, और भ्रष्टाचार से दूरी।
- यदि कानून अत्याचार या अनैतिक आदेश देता है, तब भी प्रेम-भरे नैतिक विवेक के साथ सत्य और न्याय के मार्ग परगति करें, परन्तु अव्यवस्था को बढ़ावा न दें।
- समुदाय में शांति से संवाद का मार्ग खोजें: नीति-विनियमन के अनुसार शांतिपूर्ण दलीलें और प्रभावी समुदाय-सम्भाषण को बढ़ावा दें।
एक संयुक्त व्याख्या (Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke) से संकलित संकेत
यह विचार उनके विवेक-आधारित दृष्टिकोण से जुड़ता है कि परमेश्वर ने व्यवस्था को सम्मान देने की कसौटी हर विश्वासी के लिए निर्धारित की है। Authority के संदर्भ में Henry ने कहा कि सरकार परमेश्वर के कबूल किए गए साधन हैं और उनका मान रखना दैवीय व्यवस्था की कसौटी है; Barnes ने इसे व्यक्तिगत और सामाजिक दायित्व की महत्ता के रूप में समझाया कि कानून का सम्मान करके भी हम आत्म-नियन्त्रण और ईमानदारी की शिक्षा पाते हैं; Clarke ने एक व्यवहारिक मत दिया कि कानून-पालन से विश्वासियों को समाज में स्थिरता मिलती है और शास्त्र का अनुसरण बढ़ता है। यदि आवश्यक उद्धरण हैं, वर्ष 1700-1800 के इन टिप्पणीकारों के अभिलेखीय शब्दों से संकेत मिलते हैं, परन्तु पूर्ण पाठ यहाँ नहीं दोहराया गया है।
Cross-reference नोट: यह अध्याय नागरिक अधिकार, सामाजिक व्यवस्था और ईश्वर के संस्थानों के मान सम्मान के बीच संतुलन बनाए रखने पर बल देता है। ऊपर दिये गए संदर्भ पाठ से यह स्पष्ट होता है कि विश्वासियों को कानून के शासन पर विश्वास और सम्मान दोनों रखना चाहिए, और दंड के डर से नहीं, बल्कि ईश्वरीय व्यवस्था के अनुरूप जीवन जीने से ही संतुष्टि मिलती है।
प्रत्येक जीवन के लिए सरल निष्कर्ष: ईश्वर द्वारा स्थापित क्रम के सम्मान के बिना सच-प्रभा नहीं टिकती; विश्वास के साथ कर्तव्य निभाने में ही आस्था की प्रगाढ़ता है।