Old Testament
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रोमियों 14:1 रोमियों 14:2 रोमियों 14:3 रोमियों 14:4 रोमियों 14:5 रोमियों 14:6 रोमियों 14:7 रोमियों 14:8 रोमियों 14:9 रोमियों 14:10 रोमियों 14:11 रोमियों 14:12 रोमियों 14:13 रोमियों 14:14 रोमियों 14:15 रोमियों 14:16 रोमियों 14:17 रोमियों 14:18 रोमियों 14:19 रोमियों 14:20 रोमियों 14:21 रोमियों 14:22 रोमियों 14:23



रोमियों 14:23 परिदृश्य और विचार
पद का संदर्भ रोमियों 14 में है, जहाँ लेखक विश्वास-भिन्नताओं के बीच खरे या अस्थिर आचरण के रास्ते पर विचार करता है। यहाँ विषय है: परमेश्वर की अनुमति के भीतर भोजन-आचरणों का विवेकाधारित मामला और सन्देह की स्थिति का परिणाम। यह verse विशिष्ट रूप से बताता है कि विश्वास से विचलन के बिना किया गया कर्म भी, अगर वह सन्देह से किया गया हो, दण्ड का कारण बन सकता है।
क्या यह पाठ परमेश्वर या विश्वास के बारे में बताता है
यह वाक्य दृढ़ता से बताता है कि परमेश्वर अपने लोगों के भीतर आस्था और श्रद्धा के स्थान पर सन्देह के साथ किए गए कर्म को मान्यता नहीं देता। यदि कोई व्यक्ति किसी काम में संदेह में है, तो वह उसे विश्वास के साथ नहीं कर रहा है और इसलिए उसका कर्म पाप में गिना जाता है। इसका मूल संकेत यह है कि हमारे आचरण की मान्यता केवल तर्क के अनुसार नहीं, बल्कि दिल की एकस्वीकृति और परमेश्वर के साथ स्थिर विश्वास के साथ होनी चाहिए।
किए जाने वाले शब्दों और चित्रों की स्पष्टीकरण
- सन्देह: यह वह आत्म-निश्चय या विवेक-युक्त विचार है जिसे किसी कार्य के बारे में हमारे मन में संदेह रहता है। जब हम निर्णय लेते हैं तो यदि वह विश्वास की दृढ़ता से नहीं, बल्कि संदेह से प्रेरित हो, तो वह परमेश्वर के साथ विश्वास-समरूपी नहीं ठहरता।
- विश्वास से नहीं: विश्वास एक कर्म-आधार नहीं बल्कि एक जीवन-प्रवृत्ति है। जो कुछ भी विश्वास से नहीं किया गया, वह पाप माना गया है क्योंकि वह ईश्वर के उद्देश्य के अनुरूप नहीं है।
संबद्ध वाक्य: क्रॉस-रेफरेंसेस
- रोमियों 14:1-4: एक दूसरे के विरुद्ध नहीं; नीच-उत्थान के बजाय प्रेम के सिद्धांत पर चलना। यह समझाता कि विवेक-स्वतंत्रता के बावजूद एक दूसरे की गत्यात्मकता का सम्मान कैसे किया जाए।
- 1 कुरिन्थی 8:7-13: अज्ञान के कारण का विचार और केल्व्य के कारण दूसरों के विश्वासी-जीवन पर प्रभाव; विवेकाधारित नैतिकता के सीमाओं पर बल देता है।
- ਯ 2 कुरिन्थ 5:7: विश्वास से चलना एक मार्ग है जिसे दिल से जाना जाता है, न कि केवल कानूनी आचरणों से।
आज के पाठ-जीवन में उपयोग
1) व्यक्तिगत विवेक की परख: यदि आप किसी क्रिया के बारे में संदेह में हैं, तो उसे न करें; क्योंकि आपका कर्म विश्वास से संलग्न नहीं होगा और परिणामस्वरूप वह पाप बन सकता है।
2) प्रेम-सम्प्रेषण: समुदाय में भिन्न-भिन्न फर्माओं के समय भी एक दूसरे की आस्थागत यात्रा का सम्मान करें। मत-भिन्नता के बावजूद प्रेम और शांति बनाए रखें ताकि विश्वास-जगत एकता में बढ़े।
3) समर्पण की खेती: दिनचर्या में निरंतर विश्वास के अभ्यास को दृढ़ करें— prarthana, पवित्रशब्द अध्ययन और सचेत विवेक से निर्णय— ताकि सन्देह के बजाय दृढ़ विश्वास से जीवन चले।
समापन सार
पद Rom 14:23 हमें याद दिलाता है कि ईश्वर की दृष्टि में हर कर्म की प्रेरणा एक आस्था से होकर आती है। यदि वह आस्था संदेह से दूषित हो, तो कर्म पाप की सीमा तक पहुँच सकता है। इसलिए जीवन में विवेक, प्रेम, और विश्वास के साथ कार्य करना ही वास्तविक धर्म का मार्ग है।
नोट: नीचे के उद्धरण पुराने पवित्र-व्याख्यात्मक लेखकों से संक्षेप में लिए गए हैं; किसी भी शुद्ध उद्धरण के लिए देखें Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन भाष्य।
उद्धरण-सूचना: यदि उपलब्ध हो, शुद्ध पाठ का संक्षेप प्रस्तुत किया गया है ताकि पाठ-आधार स्पष्ट रहे।