Old Testament
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रोमियों 14:17 के संदर्भ में व्याख्या
पॉल ने रोमियों के धर्मजीवियों के बीच आपसी मतभेद और खाने-पीने के मामलों में मनुष्य-आत्मशोध का संदेश दिया है। प्रकट हुआ है कि परमेश्वर के राज्य का माप-दंड केवल खाद्य-पान पर नहीं टिकता, बल्कि उसमें धार्मिकता, मिलाप और पवित्र आत्मा से निर्मित आनन्द प्रमुख हैं। यह वाक्य रोमियों 14 के संदर्भ में है जहाँ विश्वासियों के बीच तकरार और संदेह के कारण नियम-निर्भरता की प्रवृत्ति है। इस संदेश का उद्देश्य है कि परमेश्वर के राज्य की वास्तविक सत्ता आंतरिक परिवर्तन और रिश्तों की शांति में है, न कि बाहरी आचार-व्यवहारों में।
मुख्य अर्थ
यह पद “परमेश्वर का राज्य” को खाने-पीने के पारंपरिक नियमों से ऊपर रखता है। ईश्वर का राज्य वह वास्तविक निवास है जिसमें धार्मिकता (यानी ईमानदारी और सत्य), मिलाप (भ्रात्स्ग्रह और भाईचारे की एकता) और पवित्र आत्मा से आने वाला आनन्द शामिल है। यह आनन्द स्वयं परमात्मा के साथ सम्बन्ध और विश्वासियों के बीच एक सुहृदय सम्बन्ध का असर है।
दो मुख्य विषय
संलग्न विचार
- सिखाता है कि व्यक्तिगत संकल्पों के बजाय सामुदायिक सद्भाव परमेश्वर के राज्य के संकेत हैं।
- फर्माइश है कि तथाकथित धार्मिक आचार-व्यवहारों के पीछे की प्रेरणा प्रेम होनी चाहिए, न कि कृत्रिम नियमों के पालन की ठसक।
संबंधित अंश
1) रोमियों 12:18— शांति के प्रयास में, जहां संभव हो सहयोग और मेल-जोल की दिशा में कदम।
2) गलातियों 5:22–23— पवित्र आत्मा के फल जो प्रेम, खुशी, शांति आदि को दर्शाते हैं, यह भी परमेश्वर के राज्य का भाग हैं।
3) यूहन्ना 13:35— एक दूसरे के प्रति प्रेम से ही विश्व में ईसा के अनुयायियों की पहचान होती है।
व्यावहारिक चिंतन
आज के संदर्भ में ये शब्द कैसे जुड़ते हैं? चर्च में मतभेद होते हैं—खाने-पीने, रीति-रिवाज या पूजा पद्धति को लेकर। हम क्या करें? दूसरों के विवेक का सम्मान करें, परस्पर प्रेम और एकता बनाए रखें, और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में दैनिक जीवन में धार्मिकता को बनाये रखें।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यही परमेश्वर का राज्य है: एक ऐसी आंतरिक धार्मिकता, जिसमें मिलाप और पवित्र आत्मा से उत्पन्न आनन्द प्रमुख हैं—ना कि बाहरी आचार-व्यवहार। निष्ठा और प्रेम से भरा जीवन ही इसे सफल बनाता है।
महत्वपूर्ण उद्धरण (संदर्भ-योग्य): "परम्ेश्वर का राज्य खाना-पीना नहीं; परन्तु धार्मिकता और मिलाप और वह आनन्द है जो पवित्र आत्मा से होता है।" (रोमियों 14:17)