Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
रोमियों 7:1 रोमियों 7:2 रोमियों 7:3 रोमियों 7:4 रोमियों 7:5 रोमियों 7:6 रोमियों 7:7 रोमियों 7:8 रोमियों 7:9 रोमियों 7:10 रोमियों 7:11 रोमियों 7:12 रोमियों 7:13 रोमियों 7:14 रोमियों 7:15 रोमियों 7:16 रोमियों 7:17 रोमियों 7:18 रोमियों 7:19 रोमियों 7:20 रोमियों 7:21 रोमियों 7:22 रोमियों 7:23 रोमियों 7:24 रोमियों 7:25



रोमियों 7:14 — तत्कालीन स्थिति और मौलिक संकेत
पद का संदर्भ: पौलुस इस अनुभाग में अपने आंतरिक संघर्ष को प्रकट करता है—एक धर्मी इच्छा बनाम पाप की शक्ति। यहाँ वह व्यवस्था ( law ) को आत्मिक तथा पाप को शारीरिक प्रवृत्ति के रूप में अलग करके देखता है। यह उद्धृत करता है कि মুক্ত कराने वाली शक्ति कहाँ है और मनुष्य को किस मार्ग पर चलना चाहिए।
पद के उद्घाटन से उद्घाटन: आत्मिक व्यवस्था बनाम शारीरिक दुर्बलता
“वस्था तो आत्मिक है” का अर्थ है कि परमेश्वर की व्यवस्था दिव्य मानदंड है—सत्य, पवित्रता और नैतिकता का स्रोत। परन्तु “मैं शारीरिक हूँ और पाप के हाथ बिका हुआ हूँ” से वह अपने प्राकृतिक, दुर्बल स्थितिको स्वीकार करता है। यह केवल कानून की असफलता नहीं, बल्कि एक आंतरिक द्वंद्व भी दिखाता है: कानून सही है; मैं उस नैतिक आदर्श को पूरा करने में असफल हूँ क्योंकि भीतर की प्रकृति उसे पूरा करने की क्षमता नहीं देती।
क्या यह पाठ ईश्वर के बारे में बताता है?
यह स्पष्ट करता है कि परमेश्वर का मानक पवित्र है और उसकी व्यवस्था आत्मा से संचालित है, जबकि मानव प्रकृति पाप की गिरफ्त में है। परमेश्वर के आग्रह और मानव की असमर्थता के बीच यह संघर्ष एक गहरे ध्येय को दर्शाता है: मसीह के बिना नैतिकता स्वतः नहीं मिल सकती।
शब्दों का छोटा स्पष्टीकरण
संबद्ध उद्धरण और प्रभावशाली विचार
1) Matthew Henry: कानून को दिव्य रूप से पवित्र मानना और मानव की असमर्थता को स्वीकारना—“The law is holy, and the commandment holy, and just, and good.” (संक्षेप) हलके शब्दों में, Henry संकेत देते हैं कि पवित्र कानून अपने आप में दोषी नहीं, पर मनुष्य की प्राकृतिक अवस्था उसे पूरा नहीं कर सकती।
2) Albert Barnes: कानून और आत्मा के बीच द्वन्द्व को स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि शरीर शारीरिक दुर्बलता के कारण कानून का आचरण नहीं कर पाता; चित्त की आवश्यकता को देखकर उद्धार की आशा मसीह में दिखती है।
3) Adam Clarke: संस्थागत रूप से कानून की पवित्रता को स्वीकार करते हैं, पर मानव की भ्रष्ट प्रवृत्ति के कारण, कानून को पूरा करना असंभव लगता है; यही असंतोष मसीह के अनुसार उद्धार की आवश्यकता दर्शाता है।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षिप्त) और उनसे जुड़ी समझ
• रोमियों 6:14— पापअब तुम्हारे दास नहीं; क्योंकि तुम जीवात्मा से बंधे हो, न कि पाप से। यह इस द्वंद्व का समाधान मसीह में दिखाता है।
• गलातियों 5:16— आत्मा के अनुसार चलना, कामना नहीं कि शरीर के अनुसार। यह बताता है कि नया जीवन कैसे संतुलन बनाता है।
• रोम 8:2— आध्यात्मिक जीवन की नवीनता: आत्मा के द्वारा पाप कीindra शक्ति से मुक्त होना।
आज के पाठ हेतु लागू सुझाव
इस पाठ का सार: व्यवस्था पवित्र है; हमारा प्राकृतिक अस्तित्व पाप में फंसा है। सच्चा परिवर्तन केवल प्रभु यीशु मसीह के द्वारा संभव है, जो नई जीवन की शक्ति देता है।