Old Testament
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रोमियों 7:1 रोमियों 7:2 रोमियों 7:3 रोमियों 7:4 रोमियों 7:5 रोमियों 7:6 रोमियों 7:7 रोमियों 7:8 रोमियों 7:9 रोमियों 7:10 रोमियों 7:11 रोमियों 7:12 रोमियों 7:13 रोमियों 7:14 रोमियों 7:15 रोमियों 7:16 रोमियों 7:17 रोमियों 7:18 रोमियों 7:19 रोमियों 7:20 रोमियों 7:21 रोमियों 7:22 रोमियों 7:23 रोमियों 7:24 रोमियों 7:25



रोमियाँ 7:23 का पाठ्य-आँकलन
यह पंक्ति पौलुस के अनुभवजनित संघर्ष को दर्शाती है—आत्मा के भागीदार वह भी इस संसार के पाप के प्रलोभन और मार्गदर्शक व्यवहार से लड़ रहा है। रोमियों 7:23 में वह अपने भीतर एक दूसरे प्रकार की व्यवस्था देखने की बात करता है जो उसकी बुद्धि की व्यवस्था से भिड़ती है और उसे पाप की बन्धन-सी स्थिति में डालती है। यह वर्णन वह स्थिति बताता है जहाँ नए संस्कार के अनुरूप जीना चाहने के बावजूद देह का शासन उसे बाधित करता है।
प पाठ के भीतर अध्याय के संदर्भ में
रोमियों 7 अध्याय में पौलुस ने अपने व्यक्तिगत अनुभव से बतलाया है कि नैतिक संकल्प और आंतरिक इच्छा के बावजूद पाप का नियम (कसौटी) उससे दूरी नहीं बनाता, और वह आंतरिक असंतुलन का शिकार हो जाता है। 23वें पद में वह बताता है कि उसके अंगों में एक अन्य प्रकार की व्यवस्था है जो उसकी बुद्धि के नियमों के विरुद्ध चलती है और उसे पाप के बन्धनों में डालती है। यह दृश्य इस बात की ओर संकेत है कि कर्म-आत्मा और देह की प्रवृत्ति के बीच एक आंतरिक युद्ध होता है, जिसे केवल मसीही माफी और नया जीवन ही निस्तारित कर सकता है।
मुख्य आध्यात्मिक शिक्षा
अन्य बाइबल संदर्भों से संधान
– गलातियों 5:17 और रोमियों 6:12–14 इस विषय पर पूरक प्रकाश डालते हैं, जहाँ आत्मा-देह के संघर्ष का चित्रण है और प्रैक्टिकल नियंत्रण के उपाय बताए जाते हैं।
– याकूब 1:14-15 बताता है कि इच्छा से पाप जन्म लेती है और अंततः मृत्यु की ओर जाती है; परन्तु प्रभु के साथ जीवन प्रेरित होता है।
अनुवाद-वार्तालाप: HINIRV पाठ के अनुकूल व्याख्या
घटना इस प्रकार है कि पुनर्जन्म के बाद भी शरीर-प्रवृत्ति अभी तक पूरी तरह नष्ट नहीं हो पाती। जो नई आत्मा-नियति है, वह बुराई के विरुद्ध जूझती है, परन्तु यह संघर्ष विश्वास-निर्भरता और पवित्र आत्मा की सहायता से जारी रहता है। यह पंक्ति विश्वासियों के लिये आश्वस्त करती है कि वे अकेले नहीं हैं—उनके भीतर एक और व्यवस्था सामने आती है, जो ईश्वर की व्यवस्था से टकराती है, परन्तु प्रावधान यही है कि क्रूस के अनुसार जीना संभव हो सकता है।
कथनात्मक अनुप्रयोग
1) आत्म-स्वीकृति: अपने भीतर के संघर्ष को नकारे नहीं, उसे ईश्वरीय सहायता के लिए खोलें।
2) पवित्र आत्मा की चेन: दैनिक प्रार्थना, पवित्र शब्द का अध्ययन और समुदायिक संगति से आत्म-शक्ति प्राप्त करें।
3) व्यवहारिक परिवर्तन: छोटे-छोटी दैनंदिन उपलब्धियों से पाप के मार्गों पर नियंत्रण विकसित करें—जैसे झूठ, ईर्ष्या, या असत्य के पीछे से दूरी रखना।
2–3 उपयोगी क्रॉस-रेफरेंसेस
– रोमियों 8:1-4: आत्मा-जीवन की नयी विधि, देह के दमन की कमी और नयी सहजता। यह बताता है कि वाकई उद्धार के बाद जीवन कैसे बदला जा सकता है।
– गलातियों 5:16-17: आत्मा-फल बनाम देह-फलों के संघर्ष का नज़ारा देता है।
– रो. 7:25 और रो. 8:26: समाधान—यीशु मसीह के माध्यम से मुक्त जीवन और आत्मा की सहायता।
संक्षिप्त निष्कर्ष
रोमियों 7:23 हमें यह विश्वास दिलाता है कि ईश्वर के चेपरित जीवन-यात्रा में संघर्ष होते हैं, पर यह संघर्ष ईश्वरीय कृपा और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन से जीता जा सकता है।हम अपने भीतर की दो व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित कर सकते हैं—बुद्धि की व्यवस्था के अनुसार ढाल बनाने के साथ देह की प्रवृत्ति पर परमेश्वर के नीति-नियमों की सत्ता अधिक मजबूत हो।