Old Testament
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रोमियों 7:1 रोमियों 7:2 रोमियों 7:3 रोमियों 7:4 रोमियों 7:5 रोमियों 7:6 रोमियों 7:7 रोमियों 7:8 रोमियों 7:9 रोमियों 7:10 रोमियों 7:11 रोमियों 7:12 रोमियों 7:13 रोमियों 7:14 रोमियों 7:15 रोमियों 7:16 रोमियों 7:17 रोमियों 7:18 रोमियों 7:19 रोमियों 7:20 रोमियों 7:21 रोमियों 7:22 रोमियों 7:23 रोमियों 7:24 रोमियों 7:25



रोमियों 7:21 का Immediate Setting
पद स्पष्ट करता है कि दिव्य पिता की प्रेरणा से मानवी युक्ति-रचना में हमारे भीतर एक आंतरिक संघर्ष चल रहा है। पौलुस यह दिखाते हैं कि बुराई के विरुद्ध अच्छाई की इच्छा एक निरन्तर घटना है, जब हम नैतिक बहावों को पाते हैं कि हमारी प्रकृति कभी-कभी सही कदम उठाने में अवरोध पैदा करती है। यह पाठ तब आता है जब पवित्रशास्त्र सत्ता-परिवर्तन के इस सत्य को उद्घाटित करता है कि बुराई एक बाहरी दबाव नहीं बल्कि हमारी अपने भीतर की प्रवृत्ति है जिसे प्रभु के साथ संबद्ध होकर जीना सीखना महत्वपूर्ण है।
पूरी बात से ईश्वर, विश्वास, और संघर्ष का संकेत
यह आयत यह उद्घाटित करती है कि विश्वास-विकास के रास्ते में पवित्र आत्मा द्वारा चिह्नित मार्ग पर चलना कब्रगहराई से पहले, हमारे भीतर एक दुविधा उपस्थित रहती है: जो भलाई करना चाहते हैं, उन्हें बुराई के आ जाने का अनुभव होता है। यह अस्वीकृति नहीं है कि हम गलत करते हैं, परन्तु यह दर्शाता है कि न्यायप्रिय परमात्मा के साथ जुड़ना, हमारी आंतरिक लड़ाई में सहायता माँगना अनिवार्य है। यह स्थिति हमें यह सिखाती है कि पाप को जड़ से हराने के लिए प्रेरणा केवल मानव शक्ति पर निर्भर नहीं।
महत्वपूर्ण शब्दों और इमेजों की स्पष्टता
संबंधित पद और उनके संक्षेप संबंध
1) रोमियों 6:14: दासता की पूर्व दशा और आत्म-पराधीनता से मुक्त होकर नई जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा।
2) गलातियों 5:16–17: आत्मा की चाल से जीवन की दिशा और मांस की इच्छा के बीच संघर्ष की स्पष्ट प्रस्तुति।
3) याकूब 4:7: परमेश्वर के प्रति Submission और दुष्प्रवृत्तियों से पलायन का योग।
इन संदर्भों से पता चलता है कि विश्वासी जीवन में संतुलन बना रहना और आत्म-समर्थन में निरंतर ईश्वर की कृपा को माँगना आवश्यक है।
प्रमुख टिप्पणीकारों से संक्षिप्त सह्रदय विचार
Matthew Henry के अनुसार यह संघर्ष दर्शाता है कि सत्यान्वेषी जीवन में पापी तत्त्वों के विरुद्ध मनुष्य का उत्तरदायित्व बना रहता है। “The inward conflict of a believer is not rebellion against God, but the remains of our old nature.” (संदर्भ-संरचना) Albert Barnes इस बात को स्पष्ट करते हैं कि अच्छे इरादे के होते हुए भी पाप हमारे मार्ग में बाधक बन सकता है क्योंकि हमारी प्रकृति अभी पूर्ण रूप से परिवर्तनशील नहीं है। Adam Clarke इस विचार को समेकित करते हुए कहते हैं कि यह संघर्ष आत्मा और मांस के बीच आंतरिक युद्ध है, जो परमेश्वर की सहायता मांगकर जीना सिखाता है।
आज के जीवन में इसका अनुप्रयोग
- जब भी आपके भीतर भलाई की इच्छा उभरती है, कठिनाइयों के बावजूद आत्म-समर्पण और prayerful निर्णय लें।
- अपने व्यवहार की दैनिक जाँच करें कि क्या आप क्रोध, लिप्सा या भय के कारण गलत कदम उठाते हैं।
- समुदाय में एक दूसरे के लिए प्रतिफल-समर्थन बनाए रखें, ताकि आंतरिक संघर्ष में भी ईश्वर की शक्ति से मार्गदर्शन मिल सके।
Cross-references और उनका संक्षिप्त अर्थ
1) रोमियों 6:14 – परमेश्वर की आज्ञा के साथ शुद्ध जीवन की दिशा; बुराई का दबाव उनके लिए नहीं जो प्रभु के साथ रहते हैं।
2) गलातियों 5:16–17 – आत्मा की चाल से जीवन; मांस की इच्छा से संघर्ष।
3) याकूब 4:7 – परमेश्वर के साथ submitted जीवन, दुष्ट-प्रवृत्तियों से पुनः दूरी।
निष्कर्ष: इस verse में पवित्र आत्मा की सहायता और विश्वास की दीप्ति द्वारा हम यह सीखते हैं कि अच्छाई की इच्छा के बावजूद भी बुराई का आना एक सामान्य अनुभव है। ईश्वर के साथ स्थिर संबंध में हम इस संघर्ष पर विजय पाते हैं और tunay परिवर्तन की ओर बढ़ते हैं।