रोमियों 7:17 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

तो ऐसी दशा में उसका करनेवाला मैं नहीं, वरन् पाप है जो मुझ में बसा हुआ है।

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रोमियों 7:17 पद-दर-पद बाइबल टीका

रोमियों 7:17 पर टिप्पणी—मैं नहीं, वरन् पाप जो मुझ में बसा हुआ है

यह वाक्य रोमियों के पाठ में एक गहरी आत्म-चिंतन की ओर संकेत करता है कि एक ईमानदार जन अपनी नैसर्गिक अवस्था और पाप के प्रभाव से कैसे जूझता है। जब प्रेरित पौलुस कहता है, “तो ऐसी दशा में उसका करनेवाला मैं नहीं, वरन् पाप है जो मुझ में बसा हुआ है,” वह अपने अनुभव को 하나님 के प्रति सचेत और सत्यापित करने के लिए व्यक्त कर रहा है। यह केवल एक आत्म-उद्धार का निष्कर्ष नहीं, बल्कि एक सच्चे भक्त के भीतर चलने वाली आंतरिक संघर्ष की पहचान है।

यथार्थ संदर्भ और मूल विचार

रोमियों 7 अध्याय में पौलुस मानवीय विवेक और मित्र-प्रतिनियम के बीच की खींचतान बताते हैं। वे कहते हैं कि नैतिक कानून से प्रेरित होकर भी पूर्ण पवित्रता नहीं आती, क्योंकि पाप का कानून के भीतर सक्रिय अहंकार और इच्छाओं के कारण अंदर से विरोध होता है। उनके अनुसार, “जो मैं कर रहा हूँ, वह मैं नहीं कर रहा, बल्कि जो मुझ में बसा पाप कर रहा है वह कर रहा है”—यह एक असंयत विरोध की स्थिति है जिसमें पुराना אדם नई चेतना के साथ संघर्ष करता है।यह स्थिति केवल ईश्वर के साथ सही संबंध बनाने की दिशा में प्रेरित करती है, क्योंकि पाप शैतानी प्रभावों से आता है और आत्मा को उद्धार की ओर खींचता है।

मुख्य संदेश

  • आत्मिक संघर्ष स्पष्ट होता है: आत्मा ईश्वर के अनुसार जीना चाहता है, पर देह की दुर्बलताएं एक दूसरे से भिड़ जाती हैं।
  • स्व-निष्ठा बनाते समय पाप के प्रभाव को स्वीकारना आवश्यक है; यह स्व-ध्वंस नहीं, बल्कि उद्धार की प्रक्रिया की शुरुआती स्वीकृति है।
  • भक्ति में बढ़ना—क्योंकि मसीह के साथ नया जीवन आने पर, पुरानी प्रकृति की शक्तियाँ समाप्त नहीं होतीं, पर उनकी प्रभावशीलता कम होती जाती है।

उपयुक्त क्रॉस-रेफरेंसे

इन संदर्भों से आप स्पष्ट समझ पाएंगे कि पाप की सीमा और दुष्टता कैसे प्रभु की कृपा में विकसित होते हैं:

  • यहोशू 24:15 — निर्णय कि हम किसके लिए जीवित होंगे; ईश्वर के पक्ष में स्थिरता का महत्व.
  • गलातियों 5:17 — आत्मा और देह के संघर्ष का सुस्पष्ट विवरण; आत्मिक जीवन के लिए संतुलन आवश्यक है।
  • याकूब 1:14-15 — इच्छा से पाप कैसे जन्म लेती है और धैर्य के साथ पूर्णता की ओर बढ़ना क्यों आवश्यक है।

इन क्रॉस-रेफरेंसेज़ के साथ, रोमियों 7 की स्थिति किसी भी धर्म-संकीर्णतावादी विचार से ऊपर उठकर वास्तविक जीवन की परिवर्तनकारी क्रिया की ओर इशारा करती है।

पृथक विचारों से सीख

रॉम 7 में दिखे आंतरिक संघर्ष की दृष्टि से 2 प्रमुख सिद्धांत उभरते हैं:

  1. सब इंसान पाप-युक्त प्रकृति के अधीन रहते हैं, भले ही उनका ईश्वर के साथ धार्मिक अनुपालन क्यों न हो।
  2. कृपा और नया जीवन—यही वास्तविक परिवर्तन का रास्ता है; मजबूत ईमानदारी और आत्म-स्वीकृति से उद्धार का मार्ग प्रशस्त होता है।

प्रेरक विचार—देवानी व्यवस्था की दृष्टि

फिलहाल पाप के भीतर जो कमजोरी है, उसे हराने के लिए शास्त्र की शिक्षा हमें यह दिखाती है कि ईश्वर की कृपा शक्तिशाली है। यह संघर्ष वेदना बनकर न दे, बल्कि विश्वास के द्वारा परमेश्वर की सत्ता के आगे झुकना सिखाता है।

देवotional reflection

प्रिय पाठक, हमारे भीतर पवित्रता की इच्छा बनी रहती है, पर पाप कभी-कभी चुपके से नया रूप धारण कर लेता है। इसे समझना और स्वीकार करना ही पहले कदम है—यह बताता है कि आप आत्म-निर्भर नहीं, परमेश्वर के संकल्प के अधीन काम कर रहे हैं। इस संघर्ष को ईश्वर के प्रति एक ईमानदार प्रार्थना के रूप में देखें: हे प्रभु, जब मैं कमजोर पड़ता हूँ, तू अपने पवित्र आत्मा से मुझे शक्तिवान बना दे। क्योंकि सच्ची स्वतंत्रता तब मिलती है जब मैं अपने पुराने स्व को छोड़कर नए जीवन में चल पड़ता हूँ।

नोट: इस टिप्पणी के भीतर Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संजोए विचारों से आवश्यक छोटे संकेतात्मक उद्धरणों के लिए ध्यान दें। अगर आप उनके स्पष्ट शब्दों के छोटे अंश देखना चाहें तो वे नीचे शब्द-चिह्नित उद्धरणों में मिलेंगे:

Matthew Henry: “...” (यदि उपलब्ध)

Albert Barnes: “...” (यदि उपलब्ध)

Adam Clarke: “...” (यदि उपलब्ध)

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

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परन्तु यदि मैं वही करता हूँ जिसकी इच्छा नहीं करता, तो उसका करनेवाला मैं न रहा, परन्तु पाप जो मुझ में बसा हुआ है।

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क्योंकि मैं जानता हूँ, कि मुझ में अर्थात् मेरे शरीर में कोई अच्छी वस्तु वास नहीं करती, इच्छा तो मुझ में है, परन्तु भले काम मुझसे बन नहीं पड़ते। (उत्प. 6:5)

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वरन् मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूँ। जिसके कारण मैंने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूँ, ताकि मैं मसीह को प्राप्त करुँ।

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