Old Testament
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रोमियों 7:17 पर टिप्पणी—मैं नहीं, वरन् पाप जो मुझ में बसा हुआ है
यह वाक्य रोमियों के पाठ में एक गहरी आत्म-चिंतन की ओर संकेत करता है कि एक ईमानदार जन अपनी नैसर्गिक अवस्था और पाप के प्रभाव से कैसे जूझता है। जब प्रेरित पौलुस कहता है, “तो ऐसी दशा में उसका करनेवाला मैं नहीं, वरन् पाप है जो मुझ में बसा हुआ है,” वह अपने अनुभव को 하나님 के प्रति सचेत और सत्यापित करने के लिए व्यक्त कर रहा है। यह केवल एक आत्म-उद्धार का निष्कर्ष नहीं, बल्कि एक सच्चे भक्त के भीतर चलने वाली आंतरिक संघर्ष की पहचान है।
यथार्थ संदर्भ और मूल विचार
रोमियों 7 अध्याय में पौलुस मानवीय विवेक और मित्र-प्रतिनियम के बीच की खींचतान बताते हैं। वे कहते हैं कि नैतिक कानून से प्रेरित होकर भी पूर्ण पवित्रता नहीं आती, क्योंकि पाप का कानून के भीतर सक्रिय अहंकार और इच्छाओं के कारण अंदर से विरोध होता है। उनके अनुसार, “जो मैं कर रहा हूँ, वह मैं नहीं कर रहा, बल्कि जो मुझ में बसा पाप कर रहा है वह कर रहा है”—यह एक असंयत विरोध की स्थिति है जिसमें पुराना אדם नई चेतना के साथ संघर्ष करता है।यह स्थिति केवल ईश्वर के साथ सही संबंध बनाने की दिशा में प्रेरित करती है, क्योंकि पाप शैतानी प्रभावों से आता है और आत्मा को उद्धार की ओर खींचता है।
मुख्य संदेश
उपयुक्त क्रॉस-रेफरेंसे
इन संदर्भों से आप स्पष्ट समझ पाएंगे कि पाप की सीमा और दुष्टता कैसे प्रभु की कृपा में विकसित होते हैं:
इन क्रॉस-रेफरेंसेज़ के साथ, रोमियों 7 की स्थिति किसी भी धर्म-संकीर्णतावादी विचार से ऊपर उठकर वास्तविक जीवन की परिवर्तनकारी क्रिया की ओर इशारा करती है।
पृथक विचारों से सीख
रॉम 7 में दिखे आंतरिक संघर्ष की दृष्टि से 2 प्रमुख सिद्धांत उभरते हैं:
प्रेरक विचार—देवानी व्यवस्था की दृष्टि
फिलहाल पाप के भीतर जो कमजोरी है, उसे हराने के लिए शास्त्र की शिक्षा हमें यह दिखाती है कि ईश्वर की कृपा शक्तिशाली है। यह संघर्ष वेदना बनकर न दे, बल्कि विश्वास के द्वारा परमेश्वर की सत्ता के आगे झुकना सिखाता है।
देवotional reflection
प्रिय पाठक, हमारे भीतर पवित्रता की इच्छा बनी रहती है, पर पाप कभी-कभी चुपके से नया रूप धारण कर लेता है। इसे समझना और स्वीकार करना ही पहले कदम है—यह बताता है कि आप आत्म-निर्भर नहीं, परमेश्वर के संकल्प के अधीन काम कर रहे हैं। इस संघर्ष को ईश्वर के प्रति एक ईमानदार प्रार्थना के रूप में देखें: हे प्रभु, जब मैं कमजोर पड़ता हूँ, तू अपने पवित्र आत्मा से मुझे शक्तिवान बना दे। क्योंकि सच्ची स्वतंत्रता तब मिलती है जब मैं अपने पुराने स्व को छोड़कर नए जीवन में चल पड़ता हूँ।
नोट: इस टिप्पणी के भीतर Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संजोए विचारों से आवश्यक छोटे संकेतात्मक उद्धरणों के लिए ध्यान दें। अगर आप उनके स्पष्ट शब्दों के छोटे अंश देखना चाहें तो वे नीचे शब्द-चिह्नित उद्धरणों में मिलेंगे:
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