Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
रोमियों 7:1 रोमियों 7:2 रोमियों 7:3 रोमियों 7:4 रोमियों 7:5 रोमियों 7:6 रोमियों 7:7 रोमियों 7:8 रोमियों 7:9 रोमियों 7:10 रोमियों 7:11 रोमियों 7:12 रोमियों 7:13 रोमियों 7:14 रोमियों 7:15 रोमियों 7:16 रोमियों 7:17 रोमियों 7:18 रोमियों 7:19 रोमियों 7:20 रोमियों 7:21 रोमियों 7:22 रोमियों 7:23 रोमियों 7:24 रोमियों 7:25



रोमियों 7:3 (HINIRV) — त्वरित संदर्भ और समझ
यह पद एक विवाह-संस्थ्या के भीतर मायावी अपराध-युक्त नीति को समझाने के लिएRomans के अध्याय 7 में प्रयुक्त उदाहरण है। प्रेरित पौलुस यहाँ व्यवस्था-गणित को स्पष्ट कर रहे हैं कि विवाह के बंधन के साथ एक व्यक्ति की वैध या अवैध स्थिति कब तक बनी रहती है और कब वह नया विवाह के लिए व्यभिचार की परिभाषा से मुक्त हो जाता है।
टेक्स्ट का तात्पर्य—ईश्वरीय व्यवस्था और नयी स्थिति
पंक्ति कहती है: यदि पति जीवित रहते हुए उसकी पत्नी किसी अन्य पुरुष से विवाह कर लेती है, तो वह व्यभिचारिणी मानी जाएगी; परन्तु यदि पति मर जाए, तो वह उस व्यवस्था से छूट गई है, इसलिए यहां भी अगर वह किसी अन्य पुरुष से विवाह करे तो भी व्यभिचारिनी नहीं मानी जाएगी। इसका शाब्दिक तात्पर्य विवाह के नियमों और मर्यादाओं से है; मृत पति के साथ विवाह-बंधन टूट जाता है, और पत्नी नई शादी के लिए वैधानिक रूप से मुक्त हो जाती है।
परमेश्वर की योजना और विश्वास में इसका महत्व
यह पाठ दिखाता है कि परमेश्वर की व्यवस्था समय-स्थिति और रिश्तों के नियमों के अनुसार रहती है, और विश्वास-जीवन तब उन्नत होता है जब पुराने नियम की बाधाओं के भीतर से मुक्त होकर नई आत्म-समझ और मारग प्राप्त होती है। Paul यहाँ ‘मौत’ के metaphor से पुराने जीवन के अंत के बारे में बात कर रहे हैं, ताकि नया जीवन ईश्वरीय महिमा और सद्गति के लिए खुल सके।
महत्वपूर्ण शब्दों/छवियों का स्पष्टीकरण
समान विचार वाले प्रमेय—अन्य दिखावे
1) मारक-उद्धरण: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke जैसी प्राचीन टिप्पणीकारों ने इस उदाहरण को विवाह-जीवन और कानून-जीवन के बीच अस्थिर परंपरा के रूप में देखा है।
2) Barnes: यह दृश्य बताता है कि मरना और नया विवाह दोनों स्थिति-नियमन को नयी दिशा देते हैं, ताकि व्यक्ति ईश्वर की योजना के अनुसार आगे बढ़ सके।
3) Clarke: पुराने व्यवस्था और नई व्यवस्था के बीच संक्रमण को स्पष्ट करता है—प्रतीकात्मक रूप से मृत्यु पुराने नियम की निर्भरता को समाप्त करती है, ताकि नया जीवन शुरू हो सके।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप में, संकेत मात्र)
– रोमियों 6:6–7: मृत्यु से पुराने जीवन की समाप्ति; नया जीवन संभव होता है।
– मत्ती 19:8–9: विवाह-बंधन और अपवित्रता के बारे में विधान-संस्थापन की परख; पुनर्विचार के लिए उद्धार का मार्ग दिखता है।
– इब्रानियों 9:16–17: अनुसार-एक वचन-धारणाओं के भीतर, Testament के अंतर्गत वास्तविक परिवर्तन की आवश्यकता।
आज की प्रैक्टिकल उपयोगिता
- यह पाठ हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर के आह्वान में बदलाव जीवनदृष्टि और आचरण को आकार देता है; पुराने जीवन की सीमाओं के भीतर से नहीं, बल्कि मृत्यु-रेखा के पार नये जीवन की तरफ उन्मुख होना चाहिए।
- विवाहित जीवन में ईमानदारता, प्रेम और समर्पण के साथ रिश्तों की मर्यादा बनाये रखना आवश्यक है; यदि परिस्थिति बदलती है, तो परमेश्वर की दृष्टि में नई शुरुआत संभव है, शुद्ध विवेक और सत्य के साथ।
नोट: यह टिप्पणी Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के विचार-स्वर से प्रेरित है; शीर्षक और व्याख्या एक साथ मिलकर हिंदी पाठकों के लिए सहज और उपयोगी संदर्भ के रूप में प्रस्तुत है.