Old Testament
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रोमियों 7:5 — तत्काल परिचय और पवित्रता के संदर्भ में
इस पद में प्रेरित पौलुस ने शारीरिक अवस्था के समय मनुष्य के भीतर पापों की अभिलाषाओं का कार्य अनुभव कराया है, जो व्यवस्था के अनुसार मृत्यु का परिणाम उत्पन्न करने के लिए हमारे अंगों में जड़ लेती थीं। यह वक्तव्य निर्गत होता है जीवन के क्रिया-कलाप और परमेश्वर की व्यवस्था के बीच एक तात्विक तनाव के बारे में—जहाँ पाप हमारी कमजोर मानव प्रकृति के अनुसार प्रतिक्रिया करता है, और उसके कारण जीवन की गति ठहर जाती है। इस संदर्भ में हम यह समझते हैं कि पाप किसी बाहरी दुश्मन से अधिक हमारे भीतर की पूर्व-स्थापित प्रवृत्ति की ओर से सक्रिय होता है, जो व्यवस्था के नियमों के भीतर भी उभरकर हमारे आधुनिक आचरण को निर्देशित करती है।
जीवन के अनुवन के भीतर परमेश्वर की दृष्टि
पौलुस का यह वर्णन यह दर्शाता है कि पाप का प्रभाव तब अधिक प्रबल होता है जब मनुष्य शारीरिक दृष्टिकोण से जीवन जी रहा होता है—यानी जब आत्मा-निवास और विश्वास के कारण सुरक्षित पथ से भटकने के लिए अनिच्छुक नहीं होता। परमेश्वर की व्यवस्था एक नैतिक मानक है, जो साक्ष्य देती है कि असली बुराई भीतर से उभरती है, न कि केवल बाहरी चेतावनियों से। इस प्रकार धार्मिक जीवन में केवल नियमों का पालन पर्याप्त नहीं है; एक नया जन्म चाहिए जो संस्था को पवित्र बनाए और पाप के अभिशाप से छुड़ाए।
महत्वपूर्ण शब्दों की व्याख्या
अनुशंसित cross-references
1) रोमियों 6:6 — पुरानी स्वभाव के अवमूल्यन और नया जीवन शुरू करने का वास्तविक अर्थ। यह बतलाता है कि शरीर और पाप के कानून को पहचानना, ताकि हमारे दिल में नयी जीवनी उग सके।
2) गलातियों 5:17 — आत्मा और मांस के बीच का संघर्ष और क्रोध-स्वरूप अभिलषाओं पर नियंत्रण की आवश्यकता।
3) बनाम 8:3-4 — ईश्वर की कृपा—जो हमारी निर्बलताओं के बावजूद उद्धार और नई जीवन शैली की भूमिका को स्पष्ट करती है।
आज के पाठ के लिए अनुप्रयोग
यह पद हमें याद दिलाता है कि नैतिक जीवन सिर्फ नियमों का पालन मात्र नहीं है; यह आत्मा-आत्म-सम्पूर्ण परिवर्तन का परिणाम है। यदि हम विश्वास में रहते हैं, तो परमेश्वर की शक्ति से हमारे भीतर की अभिलाषाएँ नियंत्रित होती हैं और हम पवित्र जीवन की दिशा में अग्रसर होते हैं। Shariarik स्थिति में जो प्रवृत्तियाँ उभरती हैं, उनका सामना हमें आत्म-समर्पण, प्रार्थना और पवित्र पात्रता के मार्ग से करना चाहिए।
उद्धरण और संदर्भ परिचय
यह commentary, पवित्र पवित्र ग्रंथ के प्रकाश में, Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन विचारों के साथ समेकित है। यदि आप इन मार्गदर्शनों के सीधे उद्धरण देखते हैं, तो विशिष्ट वाक्यांश नीचे दिए गए हैं monetarily पाठ में उद्धृत नहीं हैं; परन्तु उनके विचार पंक्तियों के भीतर समाहित हैं।
संक्षेपित निष्कर्ष: शारीरिक अभिलाषाओं पर नियंत्रण पाने के लिए आवश्यक है कि हम आत्मा से संचालित हों और मसीह के जीवन को अपने दैनिक व्यवहार में उतारें।