Old Testament
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1 कुरिन्थियों 10:1 1 कुरिन्थियों 10:2 1 कुरिन्थियों 10:3 1 कुरिन्थियों 10:4 1 कुरिन्थियों 10:5 1 कुरिन्थियों 10:6 1 कुरिन्थियों 10:7 1 कुरिन्थियों 10:8 1 कुरिन्थियों 10:9 1 कुरिन्थियों 10:10 1 कुरिन्थियों 10:11 1 कुरिन्थियों 10:12 1 कुरिन्थियों 10:13 1 कुरिन्थियों 10:14 1 कुरिन्थियों 10:15 1 कुरिन्थियों 10:16 1 कुरिन्थियों 10:17 1 कुरिन्थियों 10:18 1 कुरिन्थियों 10:19 1 कुरिन्थियों 10:20 1 कुरिन्थियों 10:21 1 कुरिन्थियों 10:22 1 कुरिन्थियों 10:23 1 कुरिन्थियों 10:24 1 कुरिन्थियों 10:25 1 कुरिन्थियों 10:26 1 कुरिन्थियों 10:27 1 कुरिन्थियों 10:28 1 कुरिन्थियों 10:29 1 कुरिन्थियों 10:30 1 कुरिन्थियों 10:31 1 कुरिन्थियों 10:32 1 कुरिन्थियों 10:33



1 कुरिन्थियों 10:7 पर टिप्पणी
पद का संदर्भ: “और न तुम मूरत पूजनेवाले बनो; जैसे कि उनमें से कितने बन गए थे, जैसा लिखा है, ‘लोग खाने-पीने बैठे, और खेलने-कूदने उठे।’” यह शब्द 1 कुरिन्थियों की उस तीखी चेतावनी में आता है जहां पौलुस ने कुरिन्थ के प Iglesia की अत्यंत विविध स्थितियों की चर्चा की। कलिसिया के सदस्यों को पाखण्ड और जड़ता से दूर रहने के लिए बाध्य किया गया है, ताकि ईश्वर के साथ सच्चा संबंध बना रहे। यहाँ मूरत-पूজা का उदाहरण लाकर यह दिखाया गया है कि पुराने राष्ट्रों की नकल करके मूर्तिपूजा की घटनाओं से घुलना गलत है; भले ही साधारण भोजन या मनोरंजन के स्वरूप में इस तत्व का प्रवेश हो, परन्तु यह ईश्वर के साथ एकता को खतरे में डाल देता है।
मुख्य विचार
किंतु यह दो-तीन प्रमुख विषय
अनुशंसित संबंध-पंक्तियाँ
• पुराने जमाने के उन आदर्शों से दूरी बनाये रखना, जहाँ पाप-आचरण ने समाज को कठोर किया।
• पवित्रता, संयम और समुदाय की एकता—ये तीनों मिलकर एक सही ख्रीस्तीय जीवन का निर्माण करते हैं।
• ईश्वर के साथ सत्य में रहने के लिए स्वयं के दिल की परीक्षा करना चाहिए, ताकि पुनः किसी भी प्रकार की मूर्तिपूजा की आशंका न रहे।
क्रॉस-रेफरेंसेस और उनकी भूमिका
• प्रेरित पंक्ति: पुराने विश्वास-घटनों से बचना और नए जीवन-मापदंड को अपनाना—यह संदर्भ 8:1–13 में भी उपदेशित है, जहां शास्त्र स्पष्ट करता है कि ज्ञान से घृणा नहीं होनी चाहिए, पर प्रेम से शुद्धता बनी रहे।
• 1 कुरिन्थियों 8:4–6 में कहती है कि मूर्तियों से कुछ भी वास्तविक सत्ता नहीं है, फिर भी दिव्य प्रेम और चेतना से चलना चाहिए ताकि आचरण विभाजन का कारण न बने।
• रोमियों 14:5–7 में विश्वास-स्वतंत्रता के बावजूद पारस्परिक संवेदनशीलता और एकता की महत्ता बताई गई है।
व्यावहारिक चिंतन
खुद से पूछिए: क्या मेरी दिनचर्या, मनोरंजन, या सामाजिक गतिशीलता किसी प्रकार से मूर्तिपूजा या दायित्व-निष्ठा की कमी में डाल रही है? यदि हाँ, तो उसे कलिसियाई प्रेम और एकता के अनुसार संशोधित करें। अपनी आस्था को व्यक्तिगत अधिकारों के दावों से ऊपर रखा जाना चाहिए ताकि समुदाय में विश्वास मजबूत रहे।
संक्षिप्त निष्कर्ष
पौलुस का यह निर्देश कि मूरत-पूजना न हो, यह एक गहरी चेतावनी है कि पुराने बुरे उदाहरण और अनावश्यक आकर्षण नए विश्वास-जीवन में अड़चन न डालें। ईश्वर की पूजा और बहुमूल्य समुदाय की एकता के लिए आत्म-नियंत्रण, पवित्रता और प्रेम को प्राथमिकता दें।
महत्त्वपूर्ण उद्धरणों के लिए नोट: इस लेख में Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के स्पष्ट शब्दों के संक्षिप्त उल्लेख आवश्यक हो तो, नीचे उनके विचारों की प्रेरक छाया दी गई है—पर मूल पाठ के पूर्ण उद्धरण पूर्व-स्वीकृत शर्तों के अनुसार उद्धृत किए गए हैं।