Old Testament
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1 कुरिन्थियों 15:1 1 कुरिन्थियों 15:2 1 कुरिन्थियों 15:3 1 कुरिन्थियों 15:4 1 कुरिन्थियों 15:5 1 कुरिन्थियों 15:6 1 कुरिन्थियों 15:7 1 कुरिन्थियों 15:8 1 कुरिन्थियों 15:9 1 कुरिन्थियों 15:10 1 कुरिन्थियों 15:11 1 कुरिन्थियों 15:12 1 कुरिन्थियों 15:13 1 कुरिन्थियों 15:14 1 कुरिन्थियों 15:15 1 कुरिन्थियों 15:16 1 कुरिन्थियों 15:17 1 कुरिन्थियों 15:18 1 कुरिन्थियों 15:19 1 कुरिन्थियों 15:20 1 कुरिन्थियों 15:21 1 कुरिन्थियों 15:22 1 कुरिन्थियों 15:23 1 कुरिन्थियों 15:24 1 कुरिन्थियों 15:25 1 कुरिन्थियों 15:26 1 कुरिन्थियों 15:27 1 कुरिन्थियों 15:28 1 कुरिन्थियों 15:29 1 कुरिन्थियों 15:30 1 कुरिन्थियों 15:31 1 कुरिन्थियों 15:32 1 कुरिन्थियों 15:33 1 कुरिन्थियों 15:34 1 कुरिन्थियों 15:35 1 कुरिन्थियों 15:36 1 कुरिन्थियों 15:37 1 कुरिन्थियों 15:38 1 कुरिन्थियों 15:39 1 कुरिन्थियों 15:40 1 कुरिन्थियों 15:41 1 कुरिन्थियों 15:42 1 कुरिन्थियों 15:43 1 कुरिन्थियों 15:44 1 कुरिन्थियों 15:45 1 कुरिन्थियों 15:46 1 कुरिन्थियों 15:47 1 कुरिन्थियों 15:48 1 कुरिन्थियों 15:49 1 कुरिन्थियों 15:50 1 कुरिन्थियों 15:51 1 कुरिन्थियों 15:52 1 कुरिन्थियों 15:53 1 कुरिन्थियों 15:54 1 कुरिन्थियों 15:55 1 कुरिन्थियों 15:56 1 कुरिन्थियों 15:57 1 कुरिन्थियों 15:58



मुख्य अर्थ: यदि मरे हुओं के लिये बपतिस्मा लेने का कोई अर्थ नहीं तो यह व्यवहार क्यों?
1 कुरिन्थियों 15:29 में पवित्र लेख कहते हैं: “नहीं तो जो लोग मरे हुओं के लिये बपतिस्मा लेते हैं, वे क्या करेंगे? यदि मुर्दे जी उठते ही नहीं तो फिर क्यों उनके लिये बपतिस्मा लेते हैं?” इस वाक्य का उद्देश्य ईमानदार रूप से यह पूछना है कि यदि पुनरुत्थान सत्य नहीं है, तो बपतिस्मा लेने का तात्पर्य क्या है। प्रेरित पॉल यहाँ एक तर्क को निर्देशित करते हैं: यदि जी उठना नहीं हो सकता, तो हर क्रिया—खासकर बपतिस्मा—व्यर्थ हो जाता है।
संदर्भ-परिप्रेक्ष्य
यह वाक्य 1 कुरिन्थियों के बीच के चर्च में उठने वाले प्रश्नों की पृष्ठभूमि में आता है। कुरिन्थुस के ईसाइयों को विभिन्न ग़लत धारणाओं से जूझना पड़ता था, जिनमें पुनरुत्थान का प्रश्न प्रमुख था। पॉल इस मुद्दे को स्पष्ट करते हैं: यदि हमारे शारीरिक मरना के बाद भविष्य में जी उठना संभव नहीं, तो ईश्वर के आदर्श नियमों और सत्यताओं का मानना व्यर्थ हो जाएगा।
व्याख्यात्मक बिंदु
अन्य पाठों से समरूपता (क्रॉस-रेफरेंसेस)
- रोमियों 6:4 में बपतिस्मा को मरे हुए कृत्रिम जीवन से नई जीवन में प्रवेश माना गया है; यह दिखाता है कि बपतिस्मा एक आधिकारिक परिवर्तन का प्रतीक है।
- मत्ती 28:19-20 में यीशु ने प्रचार किया कि सारे देशों में चेला बनाओ, बपतिस्मा देकर और शिक्षा देकर; यह पुनरुत्थान की आशा के साथ जुड़ा है।
- 1 कुरिन्थियों 15:3-4 में पुनरुत्थान का केंद्रीय संदेश है—यदि मसीह नहीं जी उठे, तो हमारा विश्वास व्यर्थ है; पुनरुत्थान से जुड़ा कर्म-आचरण उसका प्रमाण है।
नोट: इन क्रॉस-रेफ़रेंसेस में उद्धृत पूरे पद नहीं दिए गए हैं, पर उनके विचार पाठ के तर्क से जुड़े हुए हैं।
जीवननिष्ठ निष्कर्ष
इस वाक्य से सीख मिलती है कि हमारी आस्था और दीय गई क्रिया—जैसे बपतिस्मा—एक ठोस परिणाम-गुण पर टिके हैं: पुनरुत्थान की वास्तविकता पर। अगर ईश्वर का निदान और जीवन-विश्वास वास्तव में नहीं होता, तो हर धार्मिक क्रिया का उद्देश्य खो जाता। परन्तु यदि पुनरुत्थान सच है, तो बपतिस्मा जैसे कर्म हमारे विश्वास की पुष्टि करते हैं और मार्गदर्शक बनते हैं।
संक्षेपित उपयोगी विचार
पवित्र संदर्भ से मिली विश्वसनीय ध्वनि
इस पाठ में मसीह के पुनरुत्थान और हमारे कर्मों के अर्थ से संबंध बनते हैं, जैसी पूरवर्ती टिप्पणी मोहित करती है:
“यदि मुर्दे जी उठते ही नहीं ...” यह एक तर्कशील प्रश्न है जो पाठक को आत्म-चिंतन के लिए प्रेरित करता है।