Old Testament
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1 कुरिन्थियों 6:1 1 कुरिन्थियों 6:2 1 कुरिन्थियों 6:3 1 कुरिन्थियों 6:4 1 कुरिन्थियों 6:5 1 कुरिन्थियों 6:6 1 कुरिन्थियों 6:7 1 कुरिन्थियों 6:8 1 कुरिन्थियों 6:9 1 कुरिन्थियों 6:10 1 कुरिन्थियों 6:11 1 कुरिन्थियों 6:12 1 कुरिन्थियों 6:13 1 कुरिन्थियों 6:14 1 कुरिन्थियों 6:15 1 कुरिन्थियों 6:16 1 कुरिन्थियों 6:17 1 कुरिन्थियों 6:18 1 कुरिन्थियों 6:19 1 कुरिन्थियों 6:20



1 कुरिन्थियों 6:19 — देह का मन्दिर और परमेश्वर काआत्मा
यह पद पवित्रता और स्वामित्व के विचार को स्पष्ट करता है: हमारे देह-देह का जीवन केवल व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं है, बल्कि परमेश्वर की उपस्थिति के साथ जुड़ा हुआ है। पवित्रता का यह सिद्धांत समुदाय-जीवन के लिए भी चुनौती बनता है, क्योंकि शरीर एक व्यक्तिगत मंदिर है जिसमें परमेश्वर का आत्मा निवास करता है।
पाठ का immédiate सेटिंग
पौलुस इस पत्र में कुरिन्थियों को ईसाई जीवन के व्यावहारिक क्षेत्रों—जगत की मान्यताओं, नैतिकता, वर्जित आचरण—पर मार्गदर्शन दे रहे हैं। इसी संदर्भ में इस verse में वह यह स्मरण कराते हैं कि हमारा देह-जीवन परमेश्वर से मिला है और वह हमारे भीतर रहता है।
ईश्वरीय प्रतिफ़लित तथ्य — इस वचन से क्या निकलता है
1) परमेश्वर का निवास: हमारा मन्दिर “देह” में है, न कि केवल आत्मा में अलग से; इसका आशय यह है कि परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा हमारे पूरे अस्तित्व में क्रिया-शक्ति अनुभव करता है।
2) ईश्वरीय प्राप्ति: यह देह परमेश्वर की ओर से मिला हुआ है, यानी खरीदी और संकल्पित है—स्वतंत्र स्वामित्व का आश्वासन।
3) स्वामित्व का प्रतिफल: हम अपने आप नहीं हैं; हमारा जीवन प्रभु के अधीन है, और इसका मतलब है कि देह और आत्मा दोनों का उपयोग परमेश्वर की महिमा के लिए होना चाहिए।
महत्वपूर्ण शब्द और चित्र
मंदिर (Temple)— परमेश्वर के पवित्र स्थान का प्रतीक। जैसे मंदिर में परमेश्वर का किरदार प्रमुख होता है, वैसे ही हमारा देह-जीवन भी परमेश्वर के आत्मा के स्थान बनता है।
आत्मा का निवास— पवित्र आत्मा का आना और स्थिर होना जीवन की दिशा और निर्णयों को संचालित करता है।
संबद्ध पवित्र पाठ
यही विचार अन्य स्थानों में भी घटित होता है: हमारी देह और आत्मा के संबंध को संरक्षित रखने के लिए प्रेरित किया गया है (रोम 12:1; 1 कुरिन्थियों 3:16-17) और आत्मा-जीवन के प्रति जागरूक रहने की आवश्यकता बताई गई है (यहोयहद 3:3-6 के संदर्भ में)।
प्रचलित व्याख्या से संक्षेप
कई विश्वसनीय पुरानी व्याख्याओं के अनुसार—मैथ्यू हेन्री, अल्बर्ट बर्न्स, एडम क्लार्क आदि—यह दृष्टि कि हमारा शरीर परमेश्वर के आत्मा का निवासस्थान है, नैतिक जिम्मेदारी और पवित्र जीवन के लिए दृढ़ प्रेरणा देती है। उनके संकेतों के अनुसार यह न केवल व्यक्तिगत पवित्रता, बल्कि समुदाय के भीतर एक मर्यादित जीवन की मांग भी है।
बहुवचन संदर्भ और उनके संक्षिप्त अर्थ
- रोम 6:12-13: देह को दासत्व से मुक्त कर देना और आत्मा से संचालित बने रहने की चेतावनी।
- 1 कुरिन्थियों 3:16-17: संरक्षित और पवित्र मंदिर की सुरक्षा का आह्वान।
- एफेसियों 2:22: परमेश्वर के निवासस्थान के रूप में कलीसिया और आत्मा का युग्मित घर।
आज के लिए अनुप्रयोग
सम्मिलित विचार: इस वचन के अनुसार, हमारा जीवन एक ठोस, ठहराव-युक्त मन्दिर है जिसमें परमेश्वर का आत्मा निवास करता है। यह एक प्रेरणा है कि हम स्वयं को और अपने नज़दीकी रिश्तों को ईश्वर की महिमा के लिये समर्पित करें।
उद्धरण नोट: नीचे दिए गए तीनों पवित्र-विचारकों के छोटे-कैद उद्धरणים उपलब्ध हैं जो पुरानी टिप्पणी से लिए गए हैं, और उनके शब्दों के संक्षेप आकलन शामिल हैं:
मैथ्यू हेन्री से: “देह तुम्हारा मन्दिर है, जहाँ परमेश्वर का आत्मा रहता है।”
एल्बर्ट बार्न्स से: “तुम अपने नहीं हो—यह पल-सत्य सीधे दिल से जुड़ता है।”
एडम क्लार्क से: “तुम्हारा शरीर पवित्र मन्दिर के रूप में प्रतिष्ठित है, अतः सम्मान तथा पवित्रता आवश्यक है।”