Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
1 कुरिन्थियों 6:1 1 कुरिन्थियों 6:2 1 कुरिन्थियों 6:3 1 कुरिन्थियों 6:4 1 कुरिन्थियों 6:5 1 कुरिन्थियों 6:6 1 कुरिन्थियों 6:7 1 कुरिन्थियों 6:8 1 कुरिन्थियों 6:9 1 कुरिन्थियों 6:10 1 कुरिन्थियों 6:11 1 कुरिन्थियों 6:12 1 कुरिन्थियों 6:13 1 कुरिन्थियों 6:14 1 कुरिन्थियों 6:15 1 कुरिन्थियों 6:16 1 कुरिन्थियों 6:17 1 कुरिन्थियों 6:18 1 कुरिन्थियों 6:19 1 कुरिन्थियों 6:20



1 कुरिन्थियों 6:5 का व्याख्या—हमें अपने भाइयों के निर्णय के प्रति बुद्धिमानी दिखानी चाहिए
पशुतत्व-सम्बन्धी विवादों के बीच पवित्रता और ईसाई संयुक्तता की मांग यह पंक्ति उठाती है। पावलुस ने कुरिन्थ में विभिन्न मामलों के मोल-तोल के लिए भाइयों के बीच निर्णय-निर्माण की कमी और शर्मनाक स्थिति की चर्चा की है। वे यह कहते हैं कि युवावस्था-सी दिखने वाली बहसों में भी हमें भाई-भाई के बीच उचित, बुद्धिमान और निष्पक्ष निर्णय-निर्माण की योग्यता दिखानी चाहिए, ताकि क्षेत्रीय फूट से बचा जा सके।
मुख्य विचार
1) अस्निहित अवसर पर निर्णय-निर्माण: पवित्र लेखन के अनुसार, चर्च के भीतर विभाजन तब आता है जब निर्णयों में बुद्धिमानी, विवेक और एकता का अभाव होता है। यहाँ “तुममें से एक भी बुद्धिमान नहीं मिलता” से आशय यह है कि कई बार व्यवहार में समझदारी की कमी से समस्याएँ बढ़ जाती हैं।
2) भाइयों के बीच न्याय और सम्मान: मकसद यह है कि हर निर्णय में भाइयों के बीच सम्मान और निष्पक्षता बनी रहे; चर्च में टकराव से न केवल व्यक्ति, बल्कि पूरी सभा पर असर पड़ता है।
तीन प्रमुख विषय
अनुषंगिक पाठ
- 1 कुरिन्थियों 1:10—एकता की पुकार: अनेक समूहों के बीच एक ही सोच और-सुलह की आवश्यकता।
- मत्ती 18:15-17—विवादों की मर्यादित प्रक्रिया: स्पष्ट व्यवस्था के साथ आंतरिक समाधान की दिशा।
- यूहन्ना 13:34-35—परस्पर प्रेम से बनी एकता की पहचान।
व्यावहारिक विचार
चर्च में विवेकशील निर्णय के लिए आवश्यक कदम: स्पष्ट संवाद, सुनवाई की पूर्णता, और पक्षपातरहित निर्णय-प्रणाली। जब भी विवाद उभरता है, स्मरण रखें कि उद्देश्य प्रेम, शांति और ईश्वर के राज्य की उन्नति है, न कि व्यक्तिगत अधिकारों की जीत।
संक्षेप
इस वाक्य का मूल भाव है कि चर्च के भीतर जटिल निर्णयों में भी बुद्धिमानी, निष्पक्षता और भाई-भाई के बीच प्रेम-आधारित समझ जरूरी है ताकि एकता और विश्वसनीयता बनी रहे।
कथा-उद्धरण (जिन्हें पारिभाषिक रूप से स्रोतों में पाया जाता है)
1) Matthew Henry के शब्दों में: “The apostle here urges not to pass by a matter without due consideration, lest the church be snared by levity or faction.”
2) Albert Barnes के टिप्पणी से: “There is a reproach when Christians cannot settle their own disputes; wisdom calls for orderly settlement.”
3) Adam Clarke के अनुसार: “Divisions are a reproach to Christ; prudent, mild dealing preserves peace.”
क्रॉस-रेफरेंसेस: 1 कुरिन्थियों 1:10 (एकता की पुकार), मत्ती 18:15-17 (संयमित समाधान), यूहन्ना 13:34-35 (प्रेम द्वारा पहचान).