Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
1 यूहन्ना 2:1 1 यूहन्ना 2:2 1 यूहन्ना 2:3 1 यूहन्ना 2:4 1 यूहन्ना 2:5 1 यूहन्ना 2:6 1 यूहन्ना 2:7 1 यूहन्ना 2:8 1 यूहन्ना 2:9 1 यूहन्ना 2:10 1 यूहन्ना 2:11 1 यूहन्ना 2:12 1 यूहन्ना 2:13 1 यूहन्ना 2:14 1 यूहन्ना 2:15 1 यूहन्ना 2:16 1 यूहन्ना 2:17 1 यूहन्ना 2:18 1 यूहन्ना 2:19 1 यूहन्ना 2:20 1 यूहन्ना 2:21 1 यूहन्ना 2:22 1 यूहन्ना 2:23 1 यूहन्ना 2:24 1 यूहन्ना 2:25 1 यूहन्ना 2:26 1 यूहन्ना 2:27 1 यूहन्ना 2:28 1 यूहन्ना 2:29



पाठ का संक्षेप परिचय
1 यूहन्ना 2:21 में प्रेरित योहन्ना पाठक को स्पष्ट कर रहे हैं कि उन्होंने सत्य के बारे में पूछा नहीं, ताकि वे सत्य से अनजान रहें, बल्कि इस लिए कि वे जानते हैं, और इसलिए कि कोई झूठ सत्य से नहीं जुड़ सकता। यह-वाक्य मूल रूप से जीवन-सत्य की पुष्टि और झूठ के विरुद्ध दृढ़ विश्वास को प्रकट करता है: ईश्वर की रोशनी में आकर सच मानना और शील के साथ आत्मविश्वास रखना।
पद का पाठ-सम्बद्ध पृष्ठभूमि
यह पत्र प्रेरित यूहन्ना के उत्तर-आधुनिक संदर्भ में लिखी गई है, जहाँ धार्मिक भेदभाव और वास्तविक पहचान की माँग है। 2:18–23 के प्रसंग में झूठे शिक्षकों ने कहा कि मसीह अभी नहीं आया है; पर यूहन्ना प्रगट करते हैं कि जो सच को जानता है, उसे सत्य की पुष्टि मिलती है। 2:21 इस नज़रिए को साफ करता है कि वे पहले से सत्य जानते हैं—झूठ उनकी दिशा में नहीं आ सकता।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
इस verse का मुख्य पाठ यह है: सत्य की वेदना नहीं, बल्कि सत्य की सुरक्षा। विश्वासी को ईश्वर के सत्य के साथ स्थित होना चाहिए; बरकत यही है कि गलत-विचार उसे नहीं छू पाते। झूठ वही है जो ईश्वर के प्रकाश से दूरी बनाता है; जो सत्य में है, उसे झूठ से अलग किया जा सकता है। यह हमें यीशु मसीह के प्रमाणीकरण के संगत रहने के लिए संकेत देता है—यही कारण है कि सच जानना और उसे मानना आवश्यक है।
अन्य बाइबल अंशों से संगति
छोटा-सा व्यावहारिक अनुप्रयोग
पाठ के भीतर का एकीकृत निष्कर्ष
1 यूहन्ना 2:21 कहता है कि सत्य को पहचानना और उसे पकड़ना एक ईश्वरीय कृपा है। इससे यह अनुमान होता है कि हमारा आचरण सत्य के अनुरूप होना चाहिए, और झूठ से सावधान रहना चाहिए, ताकि हमारी आस्था वास्तविक और जीवंत रहे।
संक्षेप में
जो सत्य को जानता है, उसे झूठ से नहीं जोड़ा जा सकता। यह वाक्य, सत्य की दिव्यता को मानते हुए, विश्वासियों को उनकी पहचान की पुष्टि कराता है और झूठ के चित्र से दूर रहने की प्रोत्साहना देता है।
Cross-references (संयुक्त மேற்கोण)
यूहन्ना 8:32 — सत्य से मुक्त होना; यूहन्ना 14:6 — ईसा ही सत्य है; 1 थिस्सलु.nic 5:21 — सत्य की जाँच करना और पालना करना।