Old Testament
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2 कुरिन्थियों 13:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
पर मेरी आशा है, कि तुम जान लोगे, कि हम निकम्मे नहीं।
2 कुरिन्थियों 13:6 पद-दर-पद बाइबल टीका
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2 कुरिन्थियों 13:6 समानांतर पद और संबंधित वचन
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2 कुरिन्थियों 13:10 (HINIRV) »
इस कारण मैं तुम्हारे पीठ पीछे ये बातें लिखता हूँ, कि उपस्थित होकर मुझे उस अधिकार के अनुसार जिसे प्रभु ने बिगाड़ने के लिये नहीं पर बनाने के लिये मुझे दिया है, कड़ाई से कुछ करना न पड़े।

2 कुरिन्थियों 12:20 (HINIRV) »
क्योंकि मुझे डर है, कहीं ऐसा न हो, कि मैं आकर जैसा चाहता हूँ, वैसा तुम्हें न पाऊँ; और मुझे भी जैसा तुम नहीं चाहते वैसा ही पाओ, कि तुम में झगड़ा, डाह, क्रोध, विरोध, ईर्ष्या, चुगली, अभिमान और बखेड़े हों।

2 कुरिन्थियों 13:3 (HINIRV) »
तुम तो इसका प्रमाण चाहते हो, कि मसीह मुझ में बोलता है, जो तुम्हारे लिये निर्बल नहीं; परन्तु तुम में सामर्थी है।
2 कुरिन्थियों 13:6 पर टिप्पणी: हमारी आशा कि आप जानेंगे कि हम निकम्मे नहीं
यह वाक्य पेंटेकोस्ट के आसपास की कठिनाईयों में पौलुस की विनम्रता और आत्म-निश्चय को उजागर करता है। प्रेरित का यह दावा है कि उनके वचन और परीक्षणों के पीछे ईश्वर की साक्षीता है: उन्होंने क्रिया-कौशल के बजाय सत्य और निष्कर्षपूर्ण जीवन से प्रमाण दिया है कि वे निकम्मे नहीं हैं। यह पाठ क्रिस्चियन विश्वासी के आन्तरिक नैतिकता, प्रेरित-चिन्तन और क्रियात्मक विश्वास को एक साथ बाँधता है।
प्रमुख संदर्भ और मूल संदर्भ की समझ
पौलुस ने कुरिन्थों के चर्च से आकर यह कहा कि यदि वे उनके संदेश और उपदेश की सत्यता पर संदेह करते हैं, तो वे स्वयं अपनी गवाही से विरोध-प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि वे निकम्मे नहीं हैं—यानी उन्होंने जो प्रचार किया, वह केवल मुष्किल शब्द नहीं, बल्कि व्यवहारिक जीवन द्वारा सच किया गया है। यह संदेश प्रेरित-पत्र की सामूहिक परख, विशेषकर उनके रोग-उपेक्षा, यातनाओं और कड़ा अनुभव के बीच की दृढ़-सत्यता के बीच उभरता है।
मुख्य विचार: क्या यह दावा सच है?
यह वचन एक संकेत है कि परमेश्वर की कृपा से पवित्र आराधना और साक्ष्य एक साथ चलते हैं। यदि चर्च का आचरण और संदेश एकदम असंगत हो, तो विश्वासी अपनी साख खो देंगे; परंतु यहाँ कहा गया है कि हमें भरोसा है कि प्रभु के साथ ईमानदारी और सेवा-भरा जीवन, हमारे शब्दों की सत्यता को सिद्ध करता है। इसलिए, विश्राम इस में है कि असली गवाही क्रियात्मक जीवन से मिलती है।
आस्था, परीक्षण और नैतिक जीवन
पौलुस का लक्ष्य था कि विश्वास की शक्ति और प्रभु की महिमा उनके चर्च-समुदाय के भीतर प्रकाशित हो। वे यह दिखाते हैं कि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी उनका लक्ष्य ईश्वर की मान-प्रतिष्ठा है, न कि निजी आत्म-प्रचार। प्रेरित का यह कथन, स्वयं उनके विवेक और ईमानदार उपदेश का प्रमाण है।
कुछ व्यावहारिक क्रॉस-रेफरेंसे
इन संदर्भों में एक सामान्य धागा है: सच्चाई केवल शब्दों से नहीं, बल्कि जीवन के परिणामों से प्रमाणित होती है।
ऐतिहासिक-ग्राम्य हब: अंशांकन के सुझाए स्रोत उद्धरण
अगर आप मैथ्यू हेनरी, ऐल्बर्ट बार्न्स या एडम क्लार्क के सार्वजनिक-डोमेन विचारों के छोटे-छोटे उद्धरणों को देखना चाहें, तो वे वाक्यों के भीतर आंतरिक नैतिकता और सच्चे उद्धार के संबंध में सीधे निष्कर्ष देते हैं। नीचे प्रत्येक दार्शनिक-उद्धरण के साधारण सार हों, परन्तु इन पाठ के लिए विस्तृत उद्धरण नहीं दिए गए हैं:
महत्वपूर्ण: यदि आप इन(commentaries) के सटीक एक-लाइन उद्धरण चाहते हैं, तो यह पंक्तियाँ पाठकों के लिए संदर्भ-संदेश के रूप में रखी जा सकती हैं, परंतु यहाँ पूर्ण पाठ उद्धृत नहीं है।
देवपन और devotional reflection
प्रिय पाठक, यह वचन हमें स्मरण कराता है कि परमेश्वर के लिए आध्यत्मिक सफलता का माप क्या है: हमारे शब्द कितने सच हैं और हमारे जीवन में क्रियात्मकता कितनी है। जब हम कठिन परिस्थितियों में भी विश्वास के साथ स्थिर रहते हैं, तब ईश्वर का सामर्थ्य हमारे भीतर प्रकाशमान रहता है। अपने आप को यह देखने दें कि क्या आप अपने शब्दों के अनुरूप अपने व्यवहार का जीवन भी जी रहे हैं। अगर हाँ, तो आप जानते हैं कि आप निकम्मे नहीं हैं—बल्कि निष्ठा और धैर्य के साथ चल रहे हैं।