Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
2 राजाओं 17:1 2 राजाओं 17:2 2 राजाओं 17:3 2 राजाओं 17:4 2 राजाओं 17:5 2 राजाओं 17:6 2 राजाओं 17:7 2 राजाओं 17:8 2 राजाओं 17:9 2 राजाओं 17:10 2 राजाओं 17:11 2 राजाओं 17:12 2 राजाओं 17:13 2 राजाओं 17:14 2 राजाओं 17:15 2 राजाओं 17:16 2 राजाओं 17:17 2 राजाओं 17:18 2 राजाओं 17:19 2 राजाओं 17:20 2 राजाओं 17:21 2 राजाओं 17:22 2 राजाओं 17:23 2 राजाओं 17:24 2 राजाओं 17:25 2 राजाओं 17:26 2 राजाओं 17:27 2 राजाओं 17:28 2 राजाओं 17:29 2 राजाओं 17:30 2 राजाओं 17:31 2 राजाओं 17:32 2 राजाओं 17:33 2 राजाओं 17:34 2 राजाओं 17:35 2 राजाओं 17:36 2 राजाओं 17:37 2 राजाओं 17:38 2 राजाओं 17:39 2 राजाओं 17:40 2 राजाओं 17:41



सीधे अर्थ की प्रत्यक्ष व्याख्या
2 राजाओं 17:14 में कहा गया है कि लोग फिर भी विश्वासघात करते रहे, न तो Yahweh परमेश्वर पर उनकी आस्था बनी और न उन्होंने अपने पूर्वजों के मार्गों को माना। वे हठीले बने रहे, अर्थात् उनकी भक्ति में जूड-झुक नहीं था, और वे परमेश्वर की सलाह और हस्तक्षेप को ठुकराते रहे।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यह पाठ उन्हीं दिनों का भाग है जब इस्राइल पर दुष्ट राजाओं के शासन के कारण भगवान ने निंदा की और उन्हें पाताल-उद्धार के चलन से दूर किया। इस्राइल के विभाजन के पश्चात उत्तर और दक्षिणी साम्राज्यों के लोग अक्सर परमेश्वर के साथ असमान्य आस्था दिखाते रहे। यहाँ यह अपेक्षित स्मरण है कि इतिहास के दोरान बार-बार यहूदा और इस्राइल के लोग अपने परमेश्वर से हटते रहे, और परिणामस्वरूप मूर्तिपूजा और अन्य देवताओं की उपासना बढ़ती गई।
व्याख्यात्मक संकेत
मॉडरेशन: 2-3 केंद्रीय विचार
अनुरूप क्रॉस-रेफरेंस और संकेतन
• यरमियाह 7:23–24: परमेश्वर की इच्छा पर चलते समय चाते हुए भी लोग बहकते हैं; परिणामस्वरूप उनके हृदय पथ से भटक जाते हैं।
• परमेश्वर का पहला आदेश: देवताओं के साथ नहीं, बल्कि एक ही प्रभु के साथ विश्वास बनाए रखना—यह पाठ एक बार फिर स्मरण कराता है कि परमेश्वर के साथ निरंतरता अनिवार्य है।
• दाऊद के समय के विश्वास के विरुद्ध अस्थिरता के संकेत: आस्था का स्थायित्व ही सच्ची भक्ति है।
नीतिप्रद निष्कर्ष
जो लोग अपने पुरखाओं के विश्वास से विचलित होते हैं और परमेश्वर के प्रति स्थिर न रहते, वे सामाजिक-रूढ़ियों में खो जाते हैं। इस पाठ का उद्देश्य स्पष्ट है: ईमानदारी और एकात्मक आस्था के प्रति दृढ़ता बनाए रखें, ताकि परमेश्वर की कृपा बनी रहे और जीवन में परमेश्वर के मार्ग का पालन संभव हो सके।
संक्षित, उपयोगी निष्कर्ष
यह टिप्पणी Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संकेतों के समन्वय से एक संक्षिप्त, प्रेरक परिप्रेक्ष्य देता है, जिसमें हर एक ने आस्था की स्थिरता और प्रतिकूल परिस्थितियों में परमेश्वर के प्रति निष्ठा की महत्ता को लौटाया है।
उद्धृत पंक्तियाँ:
यहाँ स्पष्ट उद्धरण केवल उन लेखकियों से हैं जिनके लिए सार्वजनिक-domain पाठ उपलब्ध हैं; पाठ में संक्षेपित विचारों के साथ निर्गत हैं।