Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
2 राजाओं 17:1 2 राजाओं 17:2 2 राजाओं 17:3 2 राजाओं 17:4 2 राजाओं 17:5 2 राजाओं 17:6 2 राजाओं 17:7 2 राजाओं 17:8 2 राजाओं 17:9 2 राजाओं 17:10 2 राजाओं 17:11 2 राजाओं 17:12 2 राजाओं 17:13 2 राजाओं 17:14 2 राजाओं 17:15 2 राजाओं 17:16 2 राजाओं 17:17 2 राजाओं 17:18 2 राजाओं 17:19 2 राजाओं 17:20 2 राजाओं 17:21 2 राजाओं 17:22 2 राजाओं 17:23 2 राजाओं 17:24 2 राजाओं 17:25 2 राजाओं 17:26 2 राजाओं 17:27 2 राजाओं 17:28 2 राजाओं 17:29 2 राजाओं 17:30 2 राजाओं 17:31 2 राजाओं 17:32 2 राजाओं 17:33 2 राजाओं 17:34 2 राजाओं 17:35 2 राजाओं 17:36 2 राजाओं 17:37 2 राजाओं 17:38 2 राजाओं 17:39 2 राजाओं 17:40 2 राजाओं 17:41



2 राजाओं 17:31 — संदर्भ के साथ अर्थ
यह वचन गैर-यहीनता के प्रतीकात्मक संकेतों के भीतर आता है, जब इश्राईल के विभाजन और विदेशियों के धार्मिक अभ्यासों के प्रभाव स्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं। इस अध्याय में यह दिखाया गया है कि कैसे बाइबल के लोग अन्य राष्ट्रों के देवताओं और रीति-रिवाजों को अपनाते हैं, जिससे उनके आराध्य एकता टूटती है और परमेश्वर के साथ उनके संबंध कमजोर पड़ते हैं। यहां अव्वियों (अव्वियाँ) और सपर्वे (शत्रु-समर्थक कुल) जैसे नामों के साथ देव-स्थापना का क्रम दिखता है, जो धर्म के साथ-साथ सामाजिक-राजनीतिक अनुष्ठानों में विविधता और अयोग्यता दोनों का संकेत देता है।
मुख्य अर्थ
Verse 31 बताता है कि निर्वासित जनजातियाँ अपने-अपने देवों को स्थापित करते हैं और अपने बच्चों को उन देवताओं के लिए होम-बलिदान चढ़ाते हैं। इसका आशय यह है कि सदाचार के स्थान पर वैयक्तिक स्वार्थ, सामाजिक दबाव और समुदायिक परंपराओं के कारण ईश्वर के निर्देशों से विचलन बढ़ता है। यह पथभ्रष्टि का एक ध्वनि-चिन्ह है—जातीय पहचान और विदेशी रीति-रिवाजों के मिश्रण से पारस बनकर परमप्रभु से दूरी बढ़ना।
केंद्रीय विषय
संबद्ध अंश (क्रॉस-रेफरेंस)
यद्यपि सीधे उद्धरण नहीं दिए जा सकते, परन्तु यह पंक्ति निम्न विचारों से मेल खाती है:
टिप्पणी-पथ (संक्षेप)
हेनरी, बॉर्न्स, और क्लार्क ने संकेत दिया है कि यह अध्याय इस बात को उजागर करता है कि कब शाश्वत ईश्वर की एकत्वपूर्ण आराधना टूटती है, तब सामाजिक-राजनीतिक दबाव और संसेकृति के कारण लोग वैसी रीति-रिवाज अपनाने लगते हैं जो ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध हैं। इस वचन में बच्चों को अव्वियों और सपर्वैमी देवताओं के लिए होम-बलिदान चढ़ाने का दृश्य यह दिखाता है कि आस्था के साथ-साथ समाज की गतिविधियाँ भी किस तरह धर्म-संरचना को विकृत कर सकती हैं।
व्यावहारिक विचार
संक्षिप्त समापन
2 राजाओं 17:31 यह स्मरण कराता है कि परमेश्वर के साथ अटूट निष्ठा तभी संभव है जब हम बाहरी प्रभावों से सतर्क रहें और बच्चों-युवा पीढ़ी के मन में सत्य-आस्था की गहराई बनाए रखें। विदेशी देवताओं के प्रति होम-बलिदानों का व्यापारिक-धर्म बनना इस बात का प्रमाण है कि एकाधार्मिकता के बिना समाजिक दबाव ईश्वर के साथ संबंधों को चोट पहुँचा सकता है।
उद्धृत टिप्पणीकारों के विचारों के साथ एक समेकित अन्तिम दृष्टिकोण यही कहता है कि परमेश्वर की एकनिष्ठा सबसे पहले है—और इसका संरक्षण हर पीढ़ी की जिम्मेदारी है।