Old Testament
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2 पतरस 3:12 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
और परमेश्वर के उस दिन की प्रतीक्षा किस रीति से करना चाहिए और उसके जल्द आने के लिये कैसा यत्न करना चाहिए; जिसके कारण आकाश आग से पिघल जाएँगे, और आकाश के गण बहुत ही तप्त होकर गल जाएँगे। (यशा. 34:4)
2 पतरस 3:12 पद-दर-पद बाइबल टीका
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2 पतरस 3:12 समानांतर पद और संबंधित वचन
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2 पतरस 3:10 (HINIRV) »
परन्तु प्रभु का दिन* चोर के समान आ जाएगा, उस दिन आकाश बड़े शोर के साथ जाता रहेगा, और तत्व बहुत ही तप्त होकर पिघल जाएँगे, और पृथ्वी और उसके कामों का न्याय होगा।

तीतुस 2:13 (HINIRV) »
और उस धन्य आशा की अर्थात् अपने महान परमेश्वर और उद्धारकर्ता यीशु मसीह की महिमा के प्रगट होने की प्रतीक्षा करते रहें।

मीका 1:4 (HINIRV) »
पहाड़ उसके नीचे गल जाएँगे, और तराई ऐसे फटेंगी, जैसे मोम आग की आँच से, और पानी जो घाट से नीचे बहता है।
2 पतरस 3:12 — परमेश्वर के दिन की प्रतीक्षा कैसे करें
पतरस के दूसरे पत्र के इस भाग में प्रेरित प्रेरितगण ने अंतिम समय की उज्जवल-आशा को उठाते हुए विश्वासियों को सचेत किया है कि परमेश्वर के दिन कैसे होगा और उसके आने के लिए किस प्रकार यत्न करना चाहिए। यहाँ लिखा गया है कि आकाश आग से पिघल जाएँगे और आकाश के गण तप्त होकर गल जाएँगे। इस दृश्य के पीछे एक गहरी चेतावनी और परम प्रेरणा है: हमारेजीवन की दृष्टि इस सच्चाई पर टिके कि ईश्वर का राज्य स्थायित्व में है और उसका प्रतिदिन का चलना उसकी योजना के अनुरूप है।
ईश्वर और विश्वास के बारे में पाठ से मिलते संदेश
यह पाठ दो बातें स्पष्ट करता है:
शब्द-चित्रों की स्पष्टता
“आकाश आग से पिघल जाएँगे” और “आकाश के गण तप्त होकर गल जाएँगे” एक ऐसी स्थिति का चित्रण करते हैं जहाँ टूटे हुए संसार की प्रत्येक तत्तव-रचना परीक्षण में पड़ेगी। इससे यह समझना जरूरी है कि परमेश्वर का आना केवल भयावह नहीं, बल्कि निष्कलंक जीवन के लिए प्रेरक है।
अन्य पाठ से संबंध
— प्राचीन भविष्य की प्रतीक्षा के बारे में यशायाह 34:4 जैसे संदर्भ दिखाते हैं कि प्रकृति के पहाड़ और आकाश भी ईश्वर की दृष्टि में परिवर्तन के संकेत हैं।
— यीशु के आगमन के प्रतीकात्मक संकेतों के साथ, यह विचार मिलते हैं कि विश्वासियों को समस्त प्रकार के दुख द्वारा भी स्थिर रहने की प्रेरणा मिलती है, ताकि वह दिन पूर्ण विश्वास के साथ迎 करें।
महत्वपूर्ण शब्दों के अर्थ
• प्रतीक्षा: धैर्यपूर्वक और जागरूक जीवन जीना, ताकि जब ईश्वर आये तो हम तैयार हों।
• यत्न: सतत श्रम और आत्म-नियंत्रण—पवित्र जीवन के आचरण, विश्वास की दृढ़ता और प्रेम की गतिशीलता।
संदर्भ-चिन्ह
1) यशायाह 34:4 — आकाश-गण और प्रकृति के परिवर्तन का संकेतक प्रतिश्रुति:
2) 2 पतरस 3:10–11 — यह बताता है कि दृढ़ विश्वास और पवित्रता के साथ हमारे जीवन की तैयारी कैसे करनी चाहिए।
3) मत्ती 24:42–44 — जागृति और सतर्कता का आह्वान, ताकि चमत्कारिक अंत के समय में अपने आप को तैयार रखें।
आज के लिए अनुप्रयोग
- जीवन में पवित्रता और नैतिकता को मजबूत बनाएं: प्रतिदिन के निर्णयों में सत्य, दया और निष्पक्षता को प्राथमिकता दें।
- आशा को स्थिर रखें: संसार के ठहराव या अस्थिरता के बावजूद ईश्वर के राज्य की आकाशगामी गवाही को अपने आचरण में दिखाएं।
- प्रेम-सेवा को बढ़ावा दें: दूसरे के लिए त्याग और मदद का व्यवहार विकसित करें, ताकि उस दिन की प्रतीक्षा हमारे रिश्तों में भी नई गहराई लाए।
उद्धरण-नोट: इस लेख में Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के बिल्कुल शब्द नहीं उद्धृत किए गए हैं; यदि उनके संकलनों से कथन लिए गए हों तो संदर्भ-चिह्न नीचे दिए जाते।