Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
दानिय्येल 9:1 दानिय्येल 9:2 दानिय्येल 9:3 दानिय्येल 9:4 दानिय्येल 9:5 दानिय्येल 9:6 दानिय्येल 9:7 दानिय्येल 9:8 दानिय्येल 9:9 दानिय्येल 9:10 दानिय्येल 9:11 दानिय्येल 9:12 दानिय्येल 9:13 दानिय्येल 9:14 दानिय्येल 9:15 दानिय्येल 9:16 दानिय्येल 9:17 दानिय्येल 9:18 दानिय्येल 9:19 दानिय्येल 9:20 दानिय्येल 9:21 दानिय्येल 9:22 दानिय्येल 9:23 दानिय्येल 9:24 दानिय्येल 9:25 दानिय्येल 9:26 दानिय्येल 9:27



दानिय्येल 9:10 पर टिप्पणी — संदर्भ सहित सार
पद आता है तब के बृहत्तर अवसर में जहाँ लोग इस्राएल ने परमेश्वर की शिक्षा को अनसुना कर दिया। दानिय्येल 9 अध्याय में द्वितीय भाग उन संदेशों का है जो बंधनों से मुक्त होकर देश-कथा की विफलताओं पर प्रकटन करते हैं। इस सन्दर्भ में 9:10 यह दर्शाता है कि वहाँ दासों के द्वारा सुनाई गई शिक्षा को भी वे नहीं मानते, भले ही परमेश्वर ने नबियों के माध्यम से उसे स्पष्ट किया हो। यह पंक्ति यह संकेत करती है कि धार्मिक आत्मसंतोष और कर्तव्यनिष्ठता में कमी के कारण इस्राएली दण्ड के अधिकारी बन गए।
केंद्रीय अर्थ
पद्य दिखाता है कि पुण्य के मानदंडों के विपरीत चलना, परमेश्वर की शिक्षा को अनसुना करना, और नबियों की चेतावनियों को नहीं मानना—ये सब मिलकर विशिष्ट जनसमुदाय की राजनीतिक-आध्यात्मिक दशा को निर्धारित करते हैं। यह उद्धृत करता है कि भले ही प्रभु ने अपने दास नबियों के माध्यम से मार्ग सुनाया, इसका अनुपालन नहीं हुआ, जिससे दण्ड और परीक्षा के समय की तीव्रता बढ़ी।
मुख्य विषय
समानांतर पाठ (छोटी cross-reference परिचय)
1) 2 राजा 18:12 — यह संदर्भ सीधे उद्धृत किया गया है; यह बताता है कि असत्य और दमन के भीतर भी परमेश्वर की शिक्षा का प्रकाश स्पष्ट था, परन्तु आत्म-स्वार्थ ने उसे अस्वीकार किया।
2) एक अन्य संदर्भ जो यह दर्शाता है कि परमेश्वर की शिक्षा केवल विचारधारा नहीं, बल्कि व्यवहार में भी आनी चाहिए, वह यह कि योशियाह और अन्य राजा-नायकों के समय में जो इशारा मिलता है, उसे मानना आवश्यक था।
3) दानिय्येल 9:14 — न्याय के लिए पश्चात्ताप और दया के साथ समय-समय पर प्रार्थना और सन्तोषी श्रद्धा का महत्त्व यह बताता है कि शिक्षा-स्वीकृति अंततः परमेश्वर के वचनों के अनुरूप जीवन में उतरनी चाहिए।
व्यावहारिक चिंतन
हम अपने समय में भी यह देख सकते हैं कि धार्मिक शिक्षा के प्रति संवेदनशीलता, नैतिकता-निष्ठा और समुदाय के लिए जिम्मेदारी कितनी कठिनाई से निभती है। जब हम प्रत्यक्ष रूप से नहीं चलते, चाहे वह पवित्र शिक्षाओं की सरल स्मरण ही क्यों न हो, तब हमारी आस्था ढीली पड़ती है। प्रेरणा के स्रोत के रूप में नबियों की बातों को गंभीरता से लेना चाहिए और दैनिक निर्णयों में उनका प्रकाश ढूंढना चाहिए—खासकर तब जब सामाजिक दबाव या राजनीतिक पूर्वाग्रह हमारे विश्वास को चुनौती दें।
संक्षेप
दानिय्येल 9:10 बताता है कि परमेश्वर की शिक्षा को सुनना और उसे मानना ही ईमानदार भक्ति का प्रमाण है। यदि हम उसे अनसुना कर दें, तो परिणामस्वरूप अदालती समय आ सकता है और दायित्व-निर्वह ना करने पर दण्ड की संभावना बढ़ती है। नबी-आधारित चेतावनियाँ हमें स्मरण कराती हैं कि भगवान का मार्ग जीवन का सही ढंग से संचालित करता है—और यह केवल बुद्धि से नहीं, बल्कि कर्मों से भी दिखना चाहिए।
एंट्री स्रोतों में Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के विचारों का संक्षिप्त समेकन यह है: शिक्षा को मानना ही धार्मिकता की बुनियाद है; नबी की चेतावनियाँ इतिहास में बहुधा सच साबित होती हैं; और निष्क्रियता के बजाय सही-निर्णय और पश्चात्ताप में जीवन का परिवर्तन देखने योग्य है।