Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
दानिय्येल 9:1 दानिय्येल 9:2 दानिय्येल 9:3 दानिय्येल 9:4 दानिय्येल 9:5 दानिय्येल 9:6 दानिय्येल 9:7 दानिय्येल 9:8 दानिय्येल 9:9 दानिय्येल 9:10 दानिय्येल 9:11 दानिय्येल 9:12 दानिय्येल 9:13 दानिय्येल 9:14 दानिय्येल 9:15 दानिय्येल 9:16 दानिय्येल 9:17 दानिय्येल 9:18 दानिय्येल 9:19 दानिय्येल 9:20 दानिय्येल 9:21 दानिय्येल 9:22 दानिय्येल 9:23 दानिय्येल 9:24 दानिय्येल 9:25 दानिय्येल 9:26 दानिय्येल 9:27



दानिय्येल 9:14 पर टिप्पणी
पद का संधर्व: दानिय्येल 9 अध्याय में प्रायः मसीह के आने से ठीक पहले की कविता-सी अवधि का संदर्भ मिलता है, जब यहोवा अपने लोगों के लिए दया और दंड के बीच निर्णय ले रहा है। यहाँ कहा गया है कि यहोवा ने ज्ञानपूर्वक परेशानी पैदा की है, ताकि धर्मी ठहरें और साथ ही यह भी स्पष्ट हो कि हमने उसकी स्तुति और वचन के पालन में चूक की है। इस संदर्भ में वाक्य एक उत्तरदायित्व-भरे पश्चाताप और ईश्वर की न्यायपूर्ण शासन की पुष्टि है।
मुख्य विचार
इस verse में दो प्रमुख धाराएँ स्पष्ट हैं: (1) परमेश्वर की धर्मी शासन और कार्य-धर्म; (2) मानवके दोष और उसकी ओर लौटने की आवश्यकता। यह दर्शाता है कि उद्धार के इतिहास में विपत्ति कभी बिना उद्देश्य के नहीं आती; वह पाप के परिणामों को प्रतिफलित करती है ताकि लोग सचेत हों और Jehovah के साथ संबंध पुनः स्थापित करें।
तीन प्रमुख विषय
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप में) एवं उनसे जुड़ी समझ
1) निर्भरता और पश्चाताप: अन्य ग्रंथों में भी पाप के कारण दुःख आता है ताकि मनुष्य ईश्वर की ओर लौटे (यशायाह/यिर्मयाह के कुछ भाग देखें) - यह Verse समाधान के लिए एक संकेत देता है कि दंड और उद्धार एक साथ चलते हैं।
2) ईश्वर की नम्रता और उद्धार: धर्मी ठहरना—यह केवल मानवीय आचरण नहीं, बल्कि परमेश्वर के करुणा-परक शासन की पुष्टि है, जिससे उद्धार का मार्ग खुलता है।
3) पश्चाताप और पुनःस्थापना: जब मानव सचेत होकर ईश्वर के आदेशों को स्वीकारे, तब उद्धार का मार्ग साफ होता है और भीतर की धरोहर–आशीर्वाद लौट आता है।
व्यावहारिक विचार
- कठिन समय में भी अपना नजरिया बदलिए: दयालु परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी रहने की कोशिश करें और पवित्र वचन की सूचित राह पर चलें।
- आत्म-निश्छलता विकसित करें: स्वयं की कमजोरियों का ईमानदारी से सत्यापन करें और पश्चातापपूर्ण-prayer से परिवर्तन की ओर बढ़ें।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यहोवा के धर्म-संरक्षण और नीति की शब्दावली में यह वचन बताता है कि विपत्ति भी ईश्वर के न्यायपूर्ण कदमों का हिस्सा है जो धर्मियों को अधिक दृढ़ बनाते हैं और मानव को उनके रिश्ते में ईश्वर के प्रति अधिक सचेत बनाते हैं। हमारी जिम्मेदारी है—उसकी सुनी और पालन करने की।
पठन-संदर्भ
1) दानिय्येल 9–12 की विस्तृत महिमा और पश्चाताप की प्रक्रिया; 2) यिर्मयाह और येशा में ईश्वर के शास्त्रीय न्याय के साथ दया का समन्वय; 3) नीतिवचन में ज्ञान और विवेक के मार्गदर्शन के लिए संकेत।
उद्धृत स्रोत-धारा: मॉडर्न-यूनीफाइड पाठ में Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक-डायस्टी टिप्पणियों से समेकित विचारों का सम्मिलन किया गया है; इनमें से यदि शुद्ध शब्द-उद्धरण मिला हो तो वही दिया गया है—उद्धरण चिन्हित कर दिए जाते हैं।