Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
दानिय्येल 9:1 दानिय्येल 9:2 दानिय्येल 9:3 दानिय्येल 9:4 दानिय्येल 9:5 दानिय्येल 9:6 दानिय्येल 9:7 दानिय्येल 9:8 दानिय्येल 9:9 दानिय्येल 9:10 दानिय्येल 9:11 दानिय्येल 9:12 दानिय्येल 9:13 दानिय्येल 9:14 दानिय्येल 9:15 दानिय्येल 9:16 दानिय्येल 9:17 दानिय्येल 9:18 दानिय्येल 9:19 दानिय्येल 9:20 दानिय्येल 9:21 दानिय्येल 9:22 दानिय्येल 9:23 दानिय्येल 9:24 दानिय्येल 9:25 दानिय्येल 9:26 दानिय्येल 9:27



दानिय्येल 9:18 का संदेह-रहित recorrido
इस पद में दानिय्येल प्रार्थना करते हुए परमेश्वर के समक्ष अपनी और यहूदी समुदाय की दशा उजागर करते हैं और दया की आवश्यकता को केंद्र में रखते हैं। वे अपने कर्मों पर नहीं, बल्कि परमेश्वर की दया पर भरोसा करते हैं और परमेश्वर के नाम में विश्राम चाहते हैं। यह संदर्भ बाबुल की captivity के बाद की वापसी और शहर के ध्वस्त बाक़ीपन के बीच गहरी प्रार्थना का प्रतिफल है।
मुख्य अर्थ क्या है?
दानिय्येल प्रार्थना में परमेश्वर से निवेदन करते हैं कि वह कान लगाए और दृष्टि लगाए ताकि उनकी उजड़ी हुई दशा और पवित्र शहर तेरा कहलाने वाला स्मरण रहे। वे अपना उद्देश्य व्यक्त करते हैं: हम तेरे सामने गिड़गिड़ाते हैं—परन्तु केवल तेरी दया के आधार पर कृपा माँगते हैं, न कि अपने कर्मों के कारण। यह विश्वासपूर्ण विनय है कि परमेश्वर केवल हमारे कामों से नहीं, बल्कि उनकी बड़ी दया से उत्तर देता है।
2-3 प्रमुख विचार
पवित्र Cross-references और उनके संक्षिप्त अर्थ
1) दानिय्येल 9:17 — नेक नियति की पुनःप्रारम्भ: प्रार्थना में दया और विश्वास का संयुक्त आग्रह।
2) दानिय्येल 9:19 — परमेश्वर की कृपा के अनुरोध की आवृत्ति और तात्कालिक उत्तर की आशा।
3) नीतियों 4:7-8 — प्रभु के दयालु गुणों के कारण वचन-वृक्ष का पुनर्जन्म संभव है।
कथन-रचना और प्रमुख विषय
यह पद हमारे सामने एक ऐसी प्रार्थना प्रस्तुत करता है जिसमें आशा का तत्त्व स्पष्ट है—हमारे कर्मों के कारण नहीं, बल्कि परमेश्वर की दया के कारण हमारी दशा बदली जा सकती है। यह सच्चे आत्म-समर्पण की शिक्षा देता है: स्वयं की योग्यता छोड़कर परमेश्वर की निर्भरता अपनाना।
व्यावहारिक विचार
जब भी हमारे जीवन में कठिनाई आये, तो पहले अपने कर्मों का जाँच करें, फिर परमेश्वर की दया पर निर्भर रहें। समुदाय के लिए प्रार्थना करते समय, यह याद रखें कि हमारी गिड़गिडाहट के पीछे परमेश्वर का नाम बढ़ाने की चाह है, न कि अपनी प्रतिष्ठा की भरपाई।
निष्कर्ष
दानिय्येल 9:18 में प्रार्थना की गहराई है—हमारी उजड़ी दशा केवल कर्म-शास्त्र से नहीं, बल्कि परमेश्वर की दया की कृपा से सुधरती है। यह संदेश समकालीन विश्वासियों के लिए भी है: हमारी निर्भरता, हमारी दया-आकांक्षा, और परमेश्वर के infinite mercy के मिलन से ही उद्धार संभव है।