Old Testament
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निर्गमन 16:1 निर्गमन 16:2 निर्गमन 16:3 निर्गमन 16:4 निर्गमन 16:5 निर्गमन 16:6 निर्गमन 16:7 निर्गमन 16:8 निर्गमन 16:9 निर्गमन 16:10 निर्गमन 16:11 निर्गमन 16:12 निर्गमन 16:13 निर्गमन 16:14 निर्गमन 16:15 निर्गमन 16:16 निर्गमन 16:17 निर्गमन 16:18 निर्गमन 16:19 निर्गमन 16:20 निर्गमन 16:21 निर्गमन 16:22 निर्गमन 16:23 निर्गमन 16:24 निर्गमन 16:25 निर्गमन 16:26 निर्गमन 16:27 निर्गमन 16:28 निर्गमन 16:29 निर्गमन 16:30 निर्गमन 16:31 निर्गमन 16:32 निर्गमन 16:33 निर्गमन 16:34 निर्गमन 16:35 निर्गमन 16:36



सीधे अर्थ का बयान
निर्गमन 16:35 के अनुसार इस्राएलियों ने चालीस वर्ष तक मन्ना खाते रहे, जब तक वे कनान देश की सीमा तक नहीं पहुँच गये।
परिप्रेक्ष्य पृष्ठभूमि
यह पाठ निर्गमन के मार्ग पर मन्ना-वृष्टि के समय का स्मरण कराता है: ईश्वर ने इस्राएलियों के लिए भोजन की व्यवस्था स्वयं की, जब वे जंगलों में यात्रा कर रहे थे और उनके वैभव-सम्पन्न खेत उपलब्ध नहीं थे। चालीस वर्ष की अवधि इस बात की पुष्टि है कि परमेश्वर के वचन के अनुसार चमत्कारी सहायता और मार्गदर्शन उपलब्ध था, भले ही वह उनकी इच्छाओं के अनुरूप सीधे स्थिरता नहीं दिखा। मन्ना एक दैनिक अनुदान था, जो उनके भरोसे और आज्ञाकारी जीवन का प्रतीक बना।
व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ
- मन्ना का दर्जा एक दिवसीय भोजन के रूप में था, जो हर दिन उतना ही मिलता था जितना आवश्यकता होती थी; इससे यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर की कृपा N每天 की जरूरतों के लिए होती है, न कि भविष्य की चिंता के लिए।
- चालीस वर्ष की अवधि इस्राएलियों के लिए एक ढाल बन गई: उनके चरित्र-निर्माण, विश्वास-गहराई और भूमि-प्राप्ति की प्रतीक्षा में। यह कालखण्ड बताता है कि परमेश्वर के समय-सारिणी में विविध बाधाओं के बावजूद, उनका हिमायती होना बना रहा।
मुख्य विचार (संक्षिप्त सूची)
अन्य संदर्भ और उनके संक्षेप अभिपादन
- निर्गमन 16:4 में कहा गया कि मन्ना उसी समय गिरता है जब प्रभु माँगते हैं; यह दिखाता है कि परमेश्वर अपने peuple की आवश्यकताओं के हिसाब से ही आशीर्वाद देता है।
- व्यवस्थाविवरण 8:3 में कहते हैं कि मन नहीं, बल्कि आत्मा से चलना चाहिये; इस पाठ से जुड़कर यह विचार स्पष्ट होता है कि परमेश्वर ने उनकी भूख के साथ उनकी आस्था को भी तराशा।
- याशा 58:11 यह संकेत देता है कि प्रभु सर्वदा साथ होता है और निर्भरता में मार्ग दिखाता है।
व्यावहारिक निष्कर्ष
जीवन के कठिन रास्तों में भी ईश्वर की प्रभुता और दया बनी रहती है। daily-प्रावधान से हमें यह सिख मिलता है कि हमारी आवश्यकताओं के समय-समय पर समाधान उस परमेश्वर से आता है जो निरंतर साथ रहता है।
टिप्पणी: नीचे उद्धृत पवित्र पाठ के समानांतर, हमें मॉडर्न अंग्रेज़ी-हिंदी अनुवादों से निश्चित-सीमा में सीख मिलती है कि विश्वास के मार्ग पर ईश्वर की दी गई मन्ना-प्राप्ति कैसे आत्म-विश्वास को उन्नत करती है।
उद्धृत विचार (Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke से आवश्यक संलग्न अनुच्छेद):
नोट: नीचे दी गई पंक्तियाँ केवल संदर्भ हेतु हैं; पूर्ण पाठ हटाया गया है।