Old Testament
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एज्रा 9:7 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
अपने पुरखाओं के दिनों से लेकर आज के दिन तक हम बड़े दोषी हैं, और अपने अधर्म के कामों के कारण हम अपने राजाओं और याजकों समेत देश-देश के राजाओं के हाथ में किए गए कि तलवार, दासत्व, लूटे जाने, और मुँह काला हो जाने की विपत्तियों में पड़ें, जैसे कि आज हमारी दशा है।
एज्रा 9:7 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
एज्रा 9:7 समानांतर पद और संबंधित वचन
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2 इतिहास 29:6 (HINIRV) »
देखो हमारे पुरखाओं ने विश्वासघात करके वह कर्म किया था, जो हमारे परमेश्वर यहोवा की दृष्टि में बुरा है और उसको तज करके यहोवा के निवास से मुँह फेरकर उसको पीठ दिखाई थी।

दानिय्येल 9:5 (HINIRV) »
हम लोगों ने तो पाप, कुटिलता, दुष्टता और बलवा किया है,* और तेरी आज्ञाओं और नियमों को तोड़ दिया है।

प्रेरितों के काम 7:51 (HINIRV) »
“हे हठीले, और मन और कान के खतनारहित लोगों, तुम सदा पवित्र आत्मा का विरोध करते हो। जैसा तुम्हारे पूर्वज करते थे, वैसे ही तुम भी करते हो। (निर्ग. 32:9, निर्ग. 33:3-5, लैव्य. 26:41, गिन. 27:14, यशा. 63:10, यिर्म. 6:10, यिर्म. 9:26)
एज्रा 9:7 — संकट के पीछे आत्म-स्वीकार और पवित्रता की पुकार
यह बैठक verse अपने आप में एक गहरी आत्म-स्वीकृति है कि परमेश्वर की प्रजा कितनी बार अपने परमेश्वर-हित से विचलित हो गई और अपनी जड़ जमाए हुई दोषों के कारण दुष्परिणामों के भीतर आ गई। यह verse दर्शाता है कि परमेश्वर की चकित करने वाली करुणा के साथ-साथ नैतिक आत्म-समर्पण और परिवर्तन की मांग भी है। यह केवल पुरानी कहानी नहीं, बल्कि हर समय के लिए सच है कि चीत्कार और पश्चाताप से ही उद्धार की राह खुलती है।
कौन-सा संदर्भ है और उसका मूल आशय
इस verse में लेखक विशेष रूप से यह स्वीकार करता है कि पुरखाओं के दिनों से अब तक की प्रवृत्ति एक ही है: दोष, अधर्म, और परमेश्वर के सामने हार। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से देखे जाए तो Ezra और याजक-ऋषि समूह अदालत-खरीद और प्रार्थना के दौरान देशवासियों के पापों के कारण बंधनों में पड़े रहने का अनुभव कर रहे थे। इस संदर्भ में यह घोषणा एक सार्वजनिक पश्चाताप का स्वर है जिसमें भ्रष्ट शासन, आड़-छिप कर किए गए अपराध, और दमनकारी घटनाओं की समुद्र-सी सूची सामने आती है।
मुख्य संदेश
- आत्म-स्वीकृति: हमारे पुरखों के दिनों से आज तक हमने बड़े दोष किए हैं।
- कारण और परिणाम: हमारे अधर्म ने देश-देश के राजाओं के हाथों में पड़ने वाले दबाव और विपत्तियों को जन्म दिया है—तलवार, दासत्व, लूट-खसोट, और अपमान।
- परिवर्तन की मांग: इतिहास की जाँच से यह स्पष्ट होता है कि केवल पश्चाताप से ही प्रायश्चर्य संभव है; यह समय-समय पर दोहराने योग्य एक नैतिक और धार्मिक पाठ है।
मुख्य थीम्स के साथ पाठकीय गाइड
अनुरूप cross-references
- न्याय और पश्चातাপ के लिए प्रेरणा: दानियेल 9:5-6 में भी नागरिक और राष्ट्र के पापों के बारे में गहन पश्चाताप और देव-स्वीकृति का स्वर है।
- विनय की गहराई: यिर्मयाह 3:22-23 में संकेत मिलता है कि पश्चाताप के साथ आशीष और उपचार आता है।
- उद्धार की राह: 2 क्रॉनिकल 7:14 बताता है कि यदि लोग नम्र होकर prarthana करें और अपने पाप छोड़ दें, तब God अपने स्वर्ग से उत्तर देगा और देश को चंगा करेगा।
प्रेरक टिप्पणी
यह verse हमें याद दिलाता है कि आध्यात्मिक पुनर्स्थापना एक सच्चे आत्म-समर्पण से शुरू होती है। यदि हम अपने दिल के अंधेरों को स्पष्ट रूप से देखते हैं—परिवार, समाज, और राष्ट्र के स्तर पर—तो ही ईश्वर की कृपा और मार्गदर्शन सम्भव है। यह पाठ विशेषकर हिंदी पाठकों के लिए एक साहसपूर्ण आह्वान है: अपने अधर्म को पहचानो, पश्चाताप करो, और पुनः विनय के साथ सत्य पालन की दिशा में कदम बढ़ाओ।
एक संक्षिप्त devotional विचार
जब हम अपने पड़ोसी के दोषों की बजाय अपने ही दोषों पर ध्यान देते हैं, तब ईश्वर के पवित्र रोशनी में परिवर्तन संभव होता है। आश्वस्त रहें कि परमेश्वर दयालु है; वह पश्चाताप को स्वीकारते हुए हमें नयी शुरुआत देता है और हमारी अगली कोशिशों में साथ रहता है।
नोट: मूल टिप्पणीकारों से कुछ चिन्हित विचार
इस Commentary में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के विचारों से प्रेरणा लेते हुए मूल संदेश को हिन्दी पाठक के लिए सहज और स्पष्ट रूप से संकलित किया गया है। यह एक साझा-सम्पूर्ण दृष्टिकोण है जिसमें उनके प्रमुख निष्कर्षों को एकीकृत किया गया है, ताकि पाठक को समुचित समझ मिल सके।