Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
उत्पत्ति 1 उत्पत्ति 2 उत्पत्ति 3 उत्पत्ति 4 उत्पत्ति 5 उत्पत्ति 6 उत्पत्ति 7 उत्पत्ति 8 उत्पत्ति 9 उत्पत्ति 10 उत्पत्ति 11 उत्पत्ति 12 उत्पत्ति 13 उत्पत्ति 14 उत्पत्ति 15 उत्पत्ति 16 उत्पत्ति 17 उत्पत्ति 18 उत्पत्ति 19 उत्पत्ति 20 उत्पत्ति 21 उत्पत्ति 22 उत्पत्ति 23 उत्पत्ति 24 उत्पत्ति 25 उत्पत्ति 26 उत्पत्ति 27 उत्पत्ति 28 उत्पत्ति 29 उत्पत्ति 30 उत्पत्ति 31 उत्पत्ति 32 उत्पत्ति 33 उत्पत्ति 34 उत्पत्ति 35 उत्पत्ति 36 उत्पत्ति 37 उत्पत्ति 38 उत्पत्ति 39 उत्पत्ति 40 उत्पत्ति 41 उत्पत्ति 42 उत्पत्ति 43 उत्पत्ति 44 उत्पत्ति 45 उत्पत्ति 46 उत्पत्ति 47 उत्पत्ति 48 उत्पत्ति 49 उत्पत्ति 50Verse
उत्पत्ति 7:1 उत्पत्ति 7:2 उत्पत्ति 7:3 उत्पत्ति 7:4 उत्पत्ति 7:5 उत्पत्ति 7:6 उत्पत्ति 7:7 उत्पत्ति 7:8 उत्पत्ति 7:9 उत्पत्ति 7:10 उत्पत्ति 7:11 उत्पत्ति 7:12 उत्पत्ति 7:13 उत्पत्ति 7:14 उत्पत्ति 7:15 उत्पत्ति 7:16 उत्पत्ति 7:17 उत्पत्ति 7:18 उत्पत्ति 7:19 उत्पत्ति 7:20 उत्पत्ति 7:21 उत्पत्ति 7:22 उत्पत्ति 7:23 उत्पत्ति 7:24

मतलब का सीधे शब्दों में सार
उत्पत्ति 7:24 का अर्थ यह है कि लगातार जल के प्रलय के कारण पृथ्वी पर एक सौ पचास दिन जल का अस्तित्व और प्रबलता बनी रही, जिससे भूमि का स्वरूप और जीवन के साधन विलीन हो गए। यह विवर्तनिक प्रलय की कड़ी ताकीद है कि ईश्वरीय निर्णय समय और अवधि के भीतर पूरा हुआ।
संदर्भीय पृष्ठभूमि
उत्पत्ति के पहले भाग में परमेश्वर ने नूह और उसकी नाव की सुरक्षा के लिए एक निर्देश दिया और जलप्रलय के माध्यम से पृथ्वी को नया मोड़ दिया। यह अवधि ईश्वरीय न्याय और दया दोनों का संकेत है: न्याय से पापों की कठोरता पर नियंत्रण, और दया से एक नया आरम्भ संभव हो गया।
व्याख्यात्मक अवलोकन
1) जल का सघन प्रबल होना तब तक बना रहा जब तक पृथ्वी पर पानी का दबाव बना रहा; इससे पहाड़ों के ढलान भी पूरी तरह ढके रहे।
2) यह अवधि एक निर्धारित परीक्षण के समान है—नूह की वहर्ता और उनकी संस्था का ठहराव इसी समय के भीतर सुरक्षित रहा, जबकि अन्य सब कुछ परिवर्तित हो गया।
3) एतिहासिक-धार्मिक संकेत के रूप में यह दिन-रात की नहीं, बल्कि समय की सीमा बताता है, जो ईश्वर के शब्द के अनुरूप पूरा हुआ।
थीमैटिक बिंदु (संक्षिप्त सूची)
अन्य इस संदर्भ से सम्बद्ध पंक्तियाँ
1) संदर्भ: जल-प्रलय के दौरान प्रलय के पूर्व और बाद की स्थितियाँ एक दूसरे से जुड़ी हैं; यह दिखाता है कि परमेश्वर की योजना समय के साथ पूरी होती है।
2) संदर्भ: पानी का प्रबल आना और फिर घटना—परिवर्तन की प्रक्रिया में विश्वास का टिकना अवश्य है।
3) संदर्भ: नया आरम्भ: पुनः पृथ्वी समानित स्थिति में पहुँचती है, जहाँ नये जीवन की संभावना खुलती है।
बोधयोग्य अनुपम अंश
यह अनुभाग हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर अपने वचनों के अनुसार कार्य करता है—निर्णय की अवधि निर्धारण लेने पर ही उद्धार संभव होता है; और जब वह समय आता है, तब नया जीवन पुनः आरम्भ होता है।
सीधा पथ-प्राप्तिकारी निष्कर्ष
यथार्थतः यह वचन हमें सिखाता है कि कठिन समय में भी परमेश्वर के आदेश और योजना के अनुसार धैर्य रखना चाहिए; क्योंकि समय आने पर वह जल-प्रलय के बाद नया आरम्भ कर देता है, और विश्वासियों को फिर से जीवन का अवसर देता है।
क्रॉस-रेफरेंसेज़ (संकल्पनात्मक उल्लेख और संक्षेप व्याख्या)
1) अन्य संदर्भ जहाँ परमेश्वर के समय-निर्धारण पर ज़ोर है; वहाँ उद्धार का क्रम ईश्वर के उद्देश्य के अनुसार चलता है—यह पक्का है कि चमत्कारी परिवर्तन एक क्रमबद्ध रूप में आता है।
2) न्याय के साथ करुणा का संतुलन दिखाने वाले संदर्भ—पाप की कठोरता पर दया के क्षण स्वतः उभरते हैं।
3) नया आरम्भ और पुनर्स्थापना के संकेत—जब पुराने जलस्तर घटते हैं तो जीवन के नए अवसर उभरते हैं।
संक्षिप्त उपदेश
परमेश्वर की योजनाओं के भीतर धैर्य रखें, क्योंकि एक निर्धारित समय के बाद पुनः जीवन और आशा की नई किरण निकलती है।
नोट: इस पाठ पर Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संक्षिप्त उद्धरण की उपलब्धता के अनुसार, उनकी मौलिक पंक्तियाँ सीधे पाठ में उद्धृत नहीं की गईं; व्याख्या उनके प्रसिद्ध व्याख्यानों के अनुरूप समेकित है।