Old Testament
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उत्पत्ति 9:3 पर टिप्पणी (HINIRV)
बादलों के प्रलय के बाद परमेश्वर ने नोआ तथा उसके परिवार के लिए नया जीवन दिया। इस वचन में परमेश्वर बताता हैं कि अब प्रत्येक जीव/जन्तु भी मनुष्य के आहार बन सकता है, तथा जैसे वह पहले हिरण-भैंस आदि पशुओं द्वारा प्राप्त होता था, अब सब कुछ उनके लिए दिया गया है ताकि उनके जीवन-यापन की राह आसान हो जाए। यह परमेश्वर की दया और व्यवस्था का संकेत है, कि उसने जीवन के विविध संसाधनों को मानव समाज के लिए साझा कर दिया है, किन्तु साथ ही यह जिम्मेदारी भी बढ़ाती है कि हम उसे सही तरीके से प्रयोग करें।
मुख्य अर्थ
यह वचन स्पष्ट करता है कि पृथ्वी पर आहार की व्यापकता अब मनुष्य के लिए खुली है। उसे ऐसा नहीं कहा गया कि पशुओं को मारना या उनका दमन करना उचित है, बल्कि यह कि सभी प्रकार के पशु-जीव अब मानव के आहार के लिए मान्य हैं, जैसे पहले पौधे थे। परमेश्वर ने सुरक्षा, संसाधन और तारण के नियमों के साथ यह नया खाँचा प्रस्तुत किया है, ताकि मानव जाति जीवनयापन कर सके।
तीन प्रमुख विषय
विश्व-वाचक संदर्भ
यह संकेत देते हैं कि प्रकृति के चीज़ें अब मानव के उत्तरदायित्व में आती हैं। देखें:
व्यावहारिक प्रभाव
1) आहार के चयन में संतुलन बनाए रखें: हर वस्तु को खाने योग्य समझना नहीं, बल्कि आवश्यकता, स्वास्थ्य और नैतिकता को प्राथमिकता दें।
2) दया और न्याय: पशुओं के जीवन की गरिमा का सम्मान करें, किसी भी दुरुपयोग से बचें।
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षेप में)
यहोवा की विशाल देनदारी: उत्पत्ति 1:29-30 बताती है कि परमेश्वर ने पौधों के साथ सभी जीवों के लिए जीवन-सरोवर बनाए।
पानी-भोजन-आधार: उत्पत्ति 9:3 का यह भाग जीवन के लिए व्यापक आहार-विस्तार को संकेत देता है, जो सृष्टि-नियमन का एक भाग है।
उद्धार के बाद का आहार-नियम: क़ौलि 3:17 जैसी शिक्षाएँ यह बताती हैं कि आहार और जीवन के हर कार्य में परमेश्वर को प्रथम माना जाए।
संक्षेप निष्कर्ष
उत्पत्ति 9:3 हमें सिखाता है कि परमेश्वर ने मनुष्य के लिए जीवन के लिए विविध भोजन की स्वतंत्रता दी है, पर यह स्वतंत्रता दायित्व के साथ आती है—संतुलन, दया और न्याय का पालन करें। जैसे पहले पौधे हर जीव के लिए स्रोत थे, अब पशु-प्राणी भी मानव की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं, पर इसकी रीति-नीति परमेश्वर के निर्देश के अनुसार ही होनी चाहिए।