Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52



यिर्मयाह 19:5 का संदर्भ और अर्थ
यिर्मयाह भविष्यवाणी के समय इस पद में परमेश्वर इस्राइल के पापों के कारण भविष्य के दण्ड को स्पष्ट कर देते हैं। उस समय के जन-समुदाय ने बाल पूजा के ऊँचे स्थान बनाकर आक्रामक रूप से पथभ्रष्टता की राह पकड़ी थी। यह वाक्य इस बात पर केंद्रित है कि लोग परमेश्वर की आज्ञाओं को तुच्छ समझ कर हर प्रकार की वैरागी प्रथा अपनाते चले गए, जिनमें उनके बच्चों की आहुति भी सम्मिलित थी। परन्तु परमेश्वर यह स्पष्ट करते हैं कि ऐसी प्रथाओं का कोई आदेश नहीं था; यह उनके मन में भी नहीं था, और न ही उसकी इच्छा के अनुरूप था।
मुख्य अर्थ
इस पद से यह स्पष्ट होता है कि बाल-पूजा जैसी रुढ़ियाँ न केवल अपराध थीं, बल्कि यह भगवान के आशीर्वाद को तोड़ना और समाज को बुराई की दिशा में ढालना था। यह संकेत देता है कि असत्यापित धार्मिक परंपराएँ भयावह परिणामों को जन्म देती हैं जब उन्होंने यह मान लिया कि यह परमेश्वर की इच्छा है।
कुंजी विषय
अनुदैह संदर्भ
• भूतपूर्व कारणों में कूड़ेदान बनते ऊँचे स्थान और बाल पूजा पर सख्त चेतावनी, जैसे अन्य स्थानों पर भी धार्मिक आचरण के मानदंडों को पुनः स्थापित करने की खोज।
• यहूदी कानून से परे संताप और दंड के संकेत—परमेश्वर के विरुद्ध किए गए आचरणों के परिणाम स्पष्ट रहते हैं।
• भविष्यवाणी में चरित्र-परिवर्तन का आह्वान: लोक-चेतना के साथ ईश्वर का सही मार्ग अपनाने की आवश्यकता।
प्रासंगिक दृश्यों से सीख
कई पहचानने योग्य पाठ इसे दिखाते हैं कि सामाजिक दबाव और जन-आस्था के मिश्रण से कभी-कभी लोग असत्य प्रथाओं को धार्मिकता समझ लेते हैं। ऐसे समय में सच्ची आत्म-चेतना और वे विश्वास जो परमेश्वर से सीधे जुड़ते हैं, आवश्यक रहते हैं।
व्यावहारिक विचार
छोटी परंतु सारगर्भित समापन
यिर्मयाह 19:5 हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर के आदेश के बाहर की धार्मिक प्रथाएं समाज को हिंसा और अंधकार की ओर ले जाती हैं। सच्ची भक्ति वही है जिसमें परमेश्वर की इच्छा सर्वोपरि मानी जाए और जो भी कर्म न तो उसके निर्देश के अनुरूप हो, उसे त्यागना उचित है।
क्रॉस-रेफरेंसे
1) यूहन् 4:1— सचतापूर्ण आत्माओं का परीक्षण करें; 2) डैनिएल 3— विदेशी व चिरस्थायी आस्थाओं के विरुद्ध दृढ़ता; 3) 2 पतरस 1:19— प्रकाश का सूरज बढ़ता है जब हम पवित्र शास्त्र के संकेतों पर चलते हैं।
नोट: नीचे दिए गए उद्धरण केवल संदर्भ के लिए हैं और पूर्ण पाठ नहीं हैं।
प्रसंग-उद्धरण (सूत्रों से)
यह अध्याय निर्णायक रूप से बताता है कि ऐतिहासिक संदर्भ में बाल-पूजा आदि परंपराओं का निषेध परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध है; यह एक प्रकार का चेतावनी है कि धार्मिक-प्रथाओं में असत्य अनुदेश कैसे सामाजिक जीवन को नुकसान पहुँचाते हैं।
उद्धरण: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke से यदि उपलब्ध हो तो ठीक-ठीक शब्दशः संक्षेप में उल्लेख किया गया है।