Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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नीतिवचन 27:4 का meaning (हिंदी, HINIRV)
इस पाठ का सरल अर्थ है: क्रोध और प्रकोप को रोकना कठिन है; ईर्ष्या के सामने कौन ठहर सकता है, यह दर्शाता है कि कुछ मनुष्य के भीतर के नापसंद भाव—क्रोध, अत्याचार, और ईर्ष्या—इनमें से कोई भी स्थिति अक्सर हिंसक प्रकोप या अपूरणीय नुकसान ला सकता है। परन्तु शत्रु बनाम क्रोध और ईर्ष्या की ताकतों के सामने, समझदारी और संयम ही स्थिरता बनाते हैं।
पृष्ठभूमि और परिप्रेक्ष্য
नीतिवचन के इस भाग में लेखक प्रज्ञा-युक्त जीवन के लिए सूक्ति देता है। यहाँ क्रोध, प्रतिशोध, और ईर्ष्या—तीनों भाव-शत्रु—मानवी जीवन के मार्ग को बिगाड़ने वाले तत्व माने जाते हैं। यह पाठ हमें दिखाता है कि तीव्र भावनाओं की ऊँच-नीच और नियंत्रणहीन शक्ति, व्यक्ति के अंतःकरण और संबंधों दोनों पर प्रभाव डालती है।
व्याख्यात्मक अवलोकन
छोटा थीमैटिक लिस्ट
अन्य संदर्भ और उनके अर्थ
यही विषय—क्रोध, क्रूरता, और ईर्ष्या—अन्य प्रतियों में भी प्रकट होते हैं:
खास उद्धरण (जिनमें Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के मौलिक विचार मिलते हैं)
इन टिप्पणीकारों के प्रकाश में इस पाठ पर विचार करते समय ध्यान केंद्रित रहता है कि: क्रोध और ईर्ष्या बाहरी घटनाओं पर निर्भर नहीं रहते; वे भीतर के विश्वास-आचरण पर निर्भर करते हैं।
महत्वपूर्ण संकेत: Matthew Henry ने कहा कभी-कभी क्रोध के कारण नष्ट हो जाने वाले परिवार और संबंधों का अनुभव सुंदर शैली में किया है। (इस पंक्ति का संक्षेप नीतिवचन के मौलिक संदेश से जुड़ा है; पूर्ण उद्धरण उपलब्ध नहीं है।)
Albert Barnes और Adam Clarke ने भी समझाया है कि ईर्ष्या और क्रोध कभी-कभी न्यायपूर्ण कारणों के बजाय अहंकार और असंतोष से उत्पन्न होते हैं, इसलिए सुधार और संयम सबसे प्रभावी उपाय होते हैं। (उद्धरण संक्षेप में है।)
व्यावहारिक निष्कर्ष
जब भी क्रोध की आग उभरती हो, या ईर्ष्या की लहर बढ़ती महसूस हो, अग्निशमन के बजाय आध्यात्मिक विवेक को पकड़ना चाहिए—धैर्य, सच का डर, और समझदारी से। कारण—तकरीर और पलायन नहीं, बल्कि पवित्रता की राह ही स्थिरता और स्वास्थ्यपूर्ण संबंध देता है।
संक्षेपित प्रभाव
इस वाक्य का उद्देश्य यह है कि जीवन में तीव्र भावनाओं के समय भी संयम और दया का मार्ग अपनाने से ही एक स्थिर, न्यायप्रिय और परमेश्वर-संतुष्ट जीवन संभव है।
Cross-references (संक्षेप में और पाठ-सम्बन्ध)
नीति का संकेत: नीचे दिये गए संदर्भ इस पाठ के साथ जोड़कर समझ को गहरा करते हैं: