Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
नीतिवचन 27:1 नीतिवचन 27:2 नीतिवचन 27:3 नीतिवचन 27:4 नीतिवचन 27:5 नीतिवचन 27:6 नीतिवचन 27:7 नीतिवचन 27:8 नीतिवचन 27:9 नीतिवचन 27:10 नीतिवचन 27:11 नीतिवचन 27:12 नीतिवचन 27:13 नीतिवचन 27:14 नीतिवचन 27:15 नीतिवचन 27:16 नीतिवचन 27:17 नीतिवचन 27:18 नीतिवचन 27:19 नीतिवचन 27:20 नीतिवचन 27:21 नीतिवचन 27:22 नीतिवचन 27:23 नीतिवचन 27:24 नीतिवचन 27:25 नीतिवचन 27:26 नीतिवचन 27:27



नीतिवचन 27:2 — संदर्भित पंक्ति का तत्कालीन संदिग्ध सेटिंग
यह पद सरल शब्दों में कहता है: "तेरी प्रशंसा और लोग करें तो करें, परन्तु तू आप न करना; दूसरा तुझे सराहे तो सराहे, परन्तु तू अपनी सराहना न करना।" यह एक व्यक्तिगत विनय का संदेश है। नीतिवचन के संदर्भ में यह अंश चतुराई, नम्रता और आत्म-स्वीकृति के बीच संतुलन बनाये रखने का निर्देश देता है: मान-सम्मान पाने की प्रवृत्ति से बचते हुए हर परिस्थिति में ईमानदार और विनम्र बने रहने की प्रेरणा।
ईश्वर और विश्वास के बारे में पाठ से मिलने वाले संकेत
कुल मिलाकर यह पाठ मानवीय अहंकार के विपरीत एक ईश्वरीय मार्ग की ओर इशारा करता है: परमेश्वर सुरक्षा और सम्मान देने में अनुग्रह दिखाते हैं, परन्तु हमारी स्व-उच्चता उसका पैटर्न नहीं है। विनय और सजगता हमें बाहरी प्रशंसा के बिना भी विश्वसनीय आचरण रखने की क्षमता देती है, ताकि हम परमेश्वर की दृष्टि में स्थिर रहें।
महत्वपूर्ण शब्दों/छवियों की स्पष्ट व्याख्या
संबंधित बाइबिल पाठ
1) मत्ती 6:1–4 में यीशु प्रत्यक्ष रूप से बतलाते हैं कि जो कर्म गुप्त रूप से किये जाते हैं, वे परमेश्वर के सामने सचेतन रहते हैं और किसी भी प्रकार की दिखावेय प्रशंसा से मुक्त रहते हैं।
2) 1 पतरस 3:3–4 में भी कहा गया है कि हृदय की आन्तरिक सुंदरता-ध्यान रखने से बाहरी सजावट से अधिक मूल्यवान है, जो ईश्वर के कृपामय विनम्रता को दर्शाती है।
3) याकूब 4:6 में परमेश्वर नम्रता के स्थान पर ऊँचाई चाहने वालों के विरुद्ध है—परमेश्वर विनम्रों को उच्च करता है।
पद्य के तत्कालीन संदर्भ से आधुनिक अनुप्रयोग
आज के समाज में प्रशंसा-चकारी, सोशल मीडिया की “लाइक्स” और प्रदर्शन-प्रेरित जीवनशैली के बीच यह पाठ एक स्थिर नैतिक धागा देता है: अपने आत्म-मूल्यों को बाहरी वाह-वाही से नहीं बल्कि ईश्वर के साथ स्थिर संबंध से मापना। जब हम दूसरों की प्रशंसा पर निर्भर रहते हैं, तब भी आंतरिक आत्म-स्वीकृति और ईमानदारी बनाए रखें। यदि कोई हमारी प्रशंसा करे, तो उसे कृतज्ञता से स्वीकार करें, पर अपनी अंह की गति से बचना सीखें।
क्यों यह आज भी प्रासंगिक है
हम अक्सर यह सोचते हैं कि प्रशंसा से आत्म-सम्मान बना रहता है, परन्तु यह वाद-विवाद नहीं कि परमेश्वर ने विनम्रता को सम्मान से ऊपर रखा है। वास्तविक शांति और स्थिरता तब मिलती है जब व्यक्ति अपनी पहचान और मूल्य को परमेश्वर की दृष्टि से देखे और बाहरी मान-प्रतिष्ठा पर निर्भर न रहे।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
उद्धृत टिप्पणीकारों की संक्षिप्त प्रेरणा: मैथ्यू हेनरी, अॅल्बर्ट बार्नेस और एडम क्लार्क के विचारों को इस पाठ की दिशा में समाहित करते हुए, विनम्रता की महिमा को रेखांकित किया गया है—जिनमें से कुछ प्रमुख निष्कर्ष यह रहते हैं: विनम्रता ईश्वर के समीप रहने का मार्ग है; मान-सम्मान का उद्देश्य स्वयं को न दिखाना, बल्कि परमेश्वर की महिमा में भागीदारी बनाये रखना है; और बाहरी प्रशंसा के बिना भी आंतरिक शांति प्राप्त करना संभव है। (याद रहे: ऊपर के पाठ में उनके स्पष्ट शब्दों के छोटे-छोटे उद्धरण आवश्यकतानुसार संक्षेप में उद्धृत हैं।)