Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
नीतिवचन 7:1 नीतिवचन 7:2 नीतिवचन 7:3 नीतिवचन 7:4 नीतिवचन 7:5 नीतिवचन 7:6 नीतिवचन 7:7 नीतिवचन 7:8 नीतिवचन 7:9 नीतिवचन 7:10 नीतिवचन 7:11 नीतिवचन 7:12 नीतिवचन 7:13 नीतिवचन 7:14 नीतिवचन 7:15 नीतिवचन 7:16 नीतिवचन 7:17 नीतिवचन 7:18 नीतिवचन 7:19 नीतिवचन 7:20 नीतिवचन 7:21 नीतिवचन 7:22 नीतिवचन 7:23 नीतिवचन 7:24 नीतिवचन 7:25 नीतिवचन 7:26 नीतिवचन 7:27
नीतिवचन 7:18 का व्याख्या: प्रेम के पथ पर एकता और विवेक
मुख्य interpretive point: व्यक्ति-जीवन में प्रेम एक सुदृढ़ दृढ़ता बनकर रिश्तों को स्थिर बनाता है। नीतिवचन 7:18 न केवल भोर तक प्रेम-जीवन की स्मृतियों को जगाता है, बल्कि यह बताता है कि विवेकपूर्ण प्रेम के बिना सच्चे जीवन की राह कठिन है। यहाँ “चल हम प्रेम से भोर तक जी बहलाते रहें” कह कर पति-पत्नी या प्रेम-संबंधित जोड़ों के बीच दिनभर की साझा सहभागिता की आदत की ओर संकेत है। इससे स्पष्ट है कि संतोष और एक-दूसरे के साथ समय बिताने से रिश्ते मजबूत होते हैं, और यह प्रस्तुत पाठ में दर्शित खतरों के सामने एक सुरक्षित मार्ग बनता है।
साहित्यिक संदर्भ (लिटरेरी कॉन्टेक्स्ट)
नीतिवचन के यह अंश पाठक को प्रेम के जीवन्त व्यवहार की एक नमुना देता है—यानी प्रेम का प्रयोग प्रत्यक्ष, नित्य, और आनंदित सहयोग के साथ होना चाहिए। यह पाठ अन्य प्राचीन सिद्धान्तों से भी संगत है जो दाम्पत्य या मित्र-यथा संबंधों में एकरसता बनी रहने की बात करते हैं, और प्रेम को कार्य-रूप में उजागर करते हैं।
धर्मशास्त्रीय意义
इस वाक्य में प्रेम एक सक्रिय पलों की पहल है, जो जीवन-रस बनाए रखता है। भोर तक जी बहलाने की प्रेरणा से पता चलता है कि व्यवहार में प्रेम-उपस्थिति निरंतर, सुसंगत और आनंदित होनी चाहिए—जोड़ों के लिए भरोसे और आनंद का आधार बनती है। यह खुद-के-लिए नहीं, बल्कि रिश्ते की सामंजस्य और परस्पर पोषण के लिए है।
पवित्र शास्त्र के साथ संबंध
- अन्य शास्त्र भी प्रेम को एक सक्रिय, सेवा-युक्त व्यवहार के रूप में प्रस्तुत करते हैं; उदाहरण के लिए प्रेम का कार्य-विवेक, परिश्रम और सौहार्दपूर्ण बाँटे हुए समय के रूप में चित्रित किया गया है।
- साथ ही, विवाह-उत्सव और एकता का संदेश कई स्थानों पर announcements देता है कि प्रेम और परस्पर सहयोग से घर में शांति और सुरक्षा बनी रहती है।
प्रतिबिंब के लिए प्रश्न
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षिप्त उल्लेख)
1) प्रेम की स्थिरता: विवाह-जीवन में प्रेम-संरक्षण के लिए एक-दूसरे के साथ नियमित समय बिताने की आवश्यकता पर बल देता है—यह कुरुवर्त्तन की दिशा में संकेत है।
2) साहचर्य और परिश्रम: परिवार के बीच संतोष और आनंद के लिए एक साथ बिताया गया समय महत्त्वपूर्ण है।
3) प्रेम का दैनिक व्यवहार: प्रेम केवल भावुक कल्पना नहीं, बल्कि हर दिन के छोटे-छोटे कदमों में प्रकट होना चाहिए।
संक्षिप्त निष्कर्ष
नीतिवचन 7:18 हमारे लिए यह बताता है कि प्रेम जीवन-यापन का एक क्रियात्मक हिस्सा है—दिनभर साथ बिताया गया समय, एक-दूसरे के प्रति गर्माहट, और सुशीलता से भरी साझेदारी। यह न केवल रिश्ते की गर्मी बनाए रखती है, बल्कि पारिवारिक वातावरण में विश्वास और आनंद की धारणा को मजबूत करती है।
उद्धरण (Public-domain commentators)
यदा-कदा Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke आदि के सार-सार विचारों का संक्षिप्त समावेश आया है। उनके स्पष्ट कथन यदि उपलब्ध हों, तो नीचे उद्धृत हैं:
यहाँ संक्षेप में उल्लेखित है कि प्रेम को एक क्रियात्मक अभ्यास माना गया है—दैनंदिन सहभागिता और एकापेक्षा अधिक आत्म-समर्पण की भाषा से यह मजबूत होता है।
सूचित उद्धरण: उपलब्ध होने पर महत्त्वपूर्ण पाठ-आधारित पंक्तियाँ सूचीबद्ध की जाएंगी; फिलहाल पूर्ण वाक्यों की प्रतिलिपि नहीं दी जा रही है।