Old Testament
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भजन संहिता 1 भजन संहिता 2 भजन संहिता 3 भजन संहिता 4 भजन संहिता 5 भजन संहिता 6 भजन संहिता 7 भजन संहिता 8 भजन संहिता 9 भजन संहिता 10 भजन संहिता 11 भजन संहिता 12 भजन संहिता 13 भजन संहिता 14 भजन संहिता 15 भजन संहिता 16 भजन संहिता 17 भजन संहिता 18 भजन संहिता 19 भजन संहिता 20 भजन संहिता 21 भजन संहिता 22 भजन संहिता 23 भजन संहिता 24 भजन संहिता 25 भजन संहिता 26 भजन संहिता 27 भजन संहिता 28 भजन संहिता 29 भजन संहिता 30 भजन संहिता 31 भजन संहिता 32 भजन संहिता 33 भजन संहिता 34 भजन संहिता 35 भजन संहिता 36 भजन संहिता 37 भजन संहिता 38 भजन संहिता 39 भजन संहिता 40 भजन संहिता 41 भजन संहिता 42 भजन संहिता 43 भजन संहिता 44 भजन संहिता 45 भजन संहिता 46 भजन संहिता 47 भजन संहिता 48 भजन संहिता 49 भजन संहिता 50 भजन संहिता 51 भजन संहिता 52 भजन संहिता 53 भजन संहिता 54 भजन संहिता 55 भजन संहिता 56 भजन संहिता 57 भजन संहिता 58 भजन संहिता 59 भजन संहिता 60 भजन संहिता 61 भजन संहिता 62 भजन संहिता 63 भजन संहिता 64 भजन संहिता 65 भजन संहिता 66 भजन संहिता 67 भजन संहिता 68 भजन संहिता 69 भजन संहिता 70 भजन संहिता 71 भजन संहिता 72 भजन संहिता 73 भजन संहिता 74 भजन संहिता 75 भजन संहिता 76 भजन संहिता 77 भजन संहिता 78 भजन संहिता 79 भजन संहिता 80 भजन संहिता 81 भजन संहिता 82 भजन संहिता 83 भजन संहिता 84 भजन संहिता 85 भजन संहिता 86 भजन संहिता 87 भजन संहिता 88 भजन संहिता 89 भजन संहिता 90 भजन संहिता 91 भजन संहिता 92 भजन संहिता 93 भजन संहिता 94 भजन संहिता 95 भजन संहिता 96 भजन संहिता 97 भजन संहिता 98 भजन संहिता 99 भजन संहिता 100 भजन संहिता 101 भजन संहिता 102 भजन संहिता 103 भजन संहिता 104 भजन संहिता 105 भजन संहिता 106 भजन संहिता 107 भजन संहिता 108 भजन संहिता 109 भजन संहिता 110 भजन संहिता 111 भजन संहिता 112 भजन संहिता 113 भजन संहिता 114 भजन संहिता 115 भजन संहिता 116 भजन संहिता 117 भजन संहिता 118 भजन संहिता 119 भजन संहिता 120 भजन संहिता 121 भजन संहिता 122 भजन संहिता 123 भजन संहिता 124 भजन संहिता 125 भजन संहिता 126 भजन संहिता 127 भजन संहिता 128 भजन संहिता 129 भजन संहिता 130 भजन संहिता 131 भजन संहिता 132 भजन संहिता 133 भजन संहिता 134 भजन संहिता 135 भजन संहिता 136 भजन संहिता 137 भजन संहिता 138 भजन संहिता 139 भजन संहिता 140 भजन संहिता 141 भजन संहिता 142 भजन संहिता 143 भजन संहिता 144 भजन संहिता 145 भजन संहिता 146 भजन संहिता 147 भजन संहिता 148 भजन संहिता 149 भजन संहिता 150



भजन संहिता 63:11 पर टिप्पणी
यह पंक्ति उस कालखण्ड की भावनात्मक और आध्यात्मिक स्थिति को चित्रित करती है जब भक्त परमेश्वर की उपस्थितिशालीनता और उसकी विश्वसनीयता में गहरी आस्था के साथ जीवन वैसे ही चलता है, जैसे किसी वफादार यात्री के लिए पेयजल से भरपूर आकाश के नीचे एक शुद्ध निर्झर। इस लेख में हम इस वचन को उसके पाठ के भीतर और उसके समकालीन प्रोत्साहन के साथ देखते हैं—कैसे परमेश्वर के सामने आनन्द और सच्चे वचन के सम्मान का महत्व उभरता है, और झूठ बोलने वालों के निष्कर्ष का लाभ किस प्रकार परमेश्वर के स्वर्गीय न्याय से जुड़ता है।
पाठ के भीतर स्थान और मुख्य विचार
हिंदी मानक बाइबिल के भाव का यह अंश भजन-संहिता 63 में भक्त का परमेश्वर के साथ गहरी जीवन-सम्बन्ध की अभिव्यक्ति है। कवि बताता है कि परमेश्वर की उपस्थिति में उसका हृदय आनंदित रहता है; वह शपथ लेने या सत्य की पुख्तगी का सम्मान करता है, और यथार्थ झूठ बोलने वालों का परिणाम स्पष्ट निशान है—मुँह बन्द। यह अध्याय परमेश्वर के साथ अस्थिर नहीं बल्कि दृढ़ संबंध की पुष्टि है, जिसमें आस्था और सत्य व्रत दोनों एक साथ चलते ہیں।
मुख्य आध्यात्मिक शिक्षा
अनुकरणीय टिप्पणियाँ: पुराने मान्य टिप्पणियों से संकलन
Matthew Henry की प्रवर्तनशील व्याख्या इस प्रकार से जोड़ती है कि परमेश्वर की उपस्थिति में—जो संतोष और सुरक्षा का आधार है—झूठ का रास्ता असुरक्षित हो जाता है; सत्यवचन और शपथपरायणता परमेश्वर के सामने सम्मान का कारण बनती है। Albert Barnes भी यह संकेत करते हैं कि धर्मी तब भी संतप्त समय में भी सत्य के पथ पर अडिग रहते हैं, और परिणामस्वरूप उनके लिए आशीर्वाद सुरक्षित रहते हैं। Adam Clarke इस पंक्ति को यह समझाते हैं कि मुँह बंद होना उस दिन के समापन का संकेत है जब असत्य और छल-छद्म अपने ढहने से पूर्व उनके प्रभाव खो देते हैं। यह तीनों टिप्पणीकार एक संगत विचार पर पहुँचते हैं: परमेश्वर के साथ निष्कलंक आस्था सत्य और निष्ठा के दामन को मजबूत बनाती है; इससे जीवन की दिशा शुद्ध होती है और सामाजिक नैतिकता को भी उजागर किया जाता है।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षिप्त):
1) भजन 24:3-4 — सत्य और पवित्रता की भूमिका परमेश्वर के सामक्ष कार्य और स्वभाव के लिए आवश्यक है; इससे जीवन में ईमानदारी के मानक स्थापित होते हैं।
2) भजन 15:1-2 — who shall dwell in your holy hill? जो सत्य और निष्कपटता के साथ रहता है, वही परमेश्वर की संरक्षा में रहता है।
3) यदि प्रेषित पद्धति के अनुसार “झूठ बोलने वालों का मुँह बन्द किया जाएगा” का विचार, ईर्ष्या या अन्याय के विरुद्ध परमेश्वर की प्रतिक्रिया पर संकेत देता है कि सत्य निष्पादन में भी शासन पाता है।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
- अपने दैनिक जीवन में सत्य बोलना, विशेषकर कठिन परिस्थितियों में भी; शब्दों और वचन में स्थिरता बनाए रखना।
- परमेश्वर की उपस्थिति में आनंद को बनाए रखना, भले बाहरी हालात कैसे भी हों। यह आस्था का स्रोत है।
- झूठ या छल से बचना और सत्य के मार्ग पर साहसपूर्वक चलना, क्योंकि यह परमेश्वर के राज्य के लिए आवश्यक नैतिकता है।
संक्षेप
भजन 63:11 में भक्त यह घोषणा करता है कि परमेश्वर के साथ रहने पर आनंद जन्म लेता है, सत्य पर अडिग रहने से आशीष मिलती है, और झूठ बोलने वालों के विरुद्ध परमेश्वर का न्याय स्पष्ट रहता है। यह वचन आस्था के साथ नैतिक सत्य के मिलन को दर्शाता है, ताकि जीवन में भक्त परमेश्वर के सम्मुख सीधे, सत्य और प्रसन्नचित्त बने रहें।
उद्धृत संकेत: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke—इन तीनों के समेकित विवेचन में यह भावना स्पष्ट है कि सत्य और निष्ठा परमेश्वर के साथ एक स्थायी संबंध बनाते हैं और असत्य के समय भी परमेश्वर की सुरक्षा में रहते हैं।