रोमियों 9:15 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

क्योंकि वह मूसा से कहता है, “मैं जिस किसी पर दया करना चाहूँ, उस पर दया करूँगा, और जिस किसी पर कृपा करना चाहूँ उसी पर कृपा करूँगा।” (निर्ग. 33:19)

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रोमियों 9:15 पद-दर-पद बाइबल टीका

रोमियों 9:15 का तत्कालीन संदर्भ और संदेश

पद का संदर्भ पवित्रशास्त्र के उस हिस्से से जुड़ा है जहाँ पौलूस ईश्वर की बारीकी से चुनी गई योजना और मानव की एकाधिकार भावना के बीच संतुलन की चर्चा कर रहे हैं। Romans 9:15 में परमेश्वर मूसा से कहा करते हैं, “मैं जिस किसी पर दया करना चाहूँ, उस पर दया करूँगा, और जिस किसी पर कृपा करना चाहूँगा उसी पर कृपा करूँगा।” निर्गमन (33:19) से उद्धृत यह कथन ईश्वर की स्वतंत्रता, न्याय और कृपा के मिसाल को स्पष्ट करता है। यहाँ परमेश्वर अपनी इच्छा और अपने स्वभाव के अनुसार संचालन करते हैं, न कि manusia की योग्यता या औचित्य के आधार पर.

ईश्वर का स्वभाव—उच्चतम दया और अधिकार

इस वाक्य के द्वारा समझ आता है कि परमेश्वर अपनी ओर से कृपा और दया के विषय में स्वतंत्र निर्णय लेते हैं। उनका उद्देश्य शाश्वत पथ में चुने गए लोगों को पवित्र बनाना और उनके लिए अपनी महिमा को प्रकट करना है। यह आदेश ईश्वर की पूर्ण सत्ता और न्याय के अनुरूप है; कोई भी भाग्य, कर्म या मानव इच्छा उसे अंतिम निर्णय से नहीं रोक सकती।

महत्वपूर्ण शब्दों की व्याख्या

  • दया (mercy): वह कृपा जो दया की निष्कलंक सक्रियता से आती है, जिसे प्राप्तकर्ता स्वयं योग्य नहीं समझ सकता।
  • कृपा (grace): स्वेच्छापूर्ण, अवज्ञा के बावजूद भी दिया गया अनुग्रह।
  • स्वतंत्र निर्णय: ईश्वर की सत्तात्मक स्वतंत्रता जो नेमतों की प्राप्ति के लिए मानवीय योग्यता से ऊपर है।

अन्य सामान्य संदर्भ/विवेचन

यह पाठ इस बात को स्पष्ट करता है कि ईश्वर की योजना मनुष्यों के योग से नहीं बंधी है। एक समान रहस्य यह है कि प्रायः धार्मिक दायित्वों में मानव भागीदारी पर निर्भरता बनती है, परन्तु परमेश्वर की प्रेरणा और चयन पूर्णतया उसकी इच्छा के अनुसार है।

Related Cross-References (संक्षेपित समझ के साथ)

रोमियों 11:33-34: ईश्वर की निर्णय-शक्ति असीम है और उस की योजना का उद्देश्य ही उसकी महिमा है। यह दिखाता है कि कौन उसकी कृपा पाए और कौन नहीं—यह सब उसकी इच्छा पर निर्भर है।

निर्गमन 33:19: मूल उद्धरण, जहाँ ईश्वर ने मूसा से कहा कि वह दया करेगा, कृपा करेगा—जो उसकी इच्छा और आदेश के अनुसार होता है।

यूहन्ना 6:44: पवित्र आत्मा की प्रेरणा से कोई भी आगे बढ़ सकता है—यही दर्शाता है कि ईश्वर की कृपा कैसे सक्रिय होती है।

आज के समय में उपयोगी अनुप्रयोग

1) आत्म-ध्यान: ईश्वर की कृपा के लिए हमें स्वयं को योग्य मानने से पहले उसकी दया की आवश्यकता पर निर्भर रहना है।

2) विनम्रता: हमारी तुलना में ईश्वर की दृष्टि अत्यंत विशाल और स्वतंत्र है; हम उसे पूछने और उसकी योजना मानने के लिए तैयार रहें।

3) विश्वास के केंद्र में कृपा: चर्च को यह याद दिलाती है कि विश्वास का मूल स्रोत ईश्वर की कृपा है, न अपनी योग्यता, और उसे प्राप्त करना एक ऐसी सहज जिम्मेदारी है जिसे वह हमें देता है।

कैसे पढ़ें

पाठ मजबूत करता है कि ईश्वर की कृपा चयन का कारण नहीं, बल्कि उसकी महिमा और योजना का कार्य है। पढ़ते समय शब्दों के भीतर ईश्वर के स्वतंत्र निर्णय और मानव की निर्बल स्थिति के बीच संतुलन को ध्यान में रखें।

नोट: नीचे उद्धृत चारित्रिक टिप्पणीकारों में से 2–3 वाक्य उनके विचार से संक्षेप में दिए गए हैं—यह सभी सार्वजनिक-डोमेन विचार हैं और पाठ के साथ एकीकृत हैं।

संक्षिप्त टिप्पणीकार उपयोग

Matthew Henry: ईश्वर की कृपा की स्वर्गीय स्वतंत्रता और चुने हुए के लिए दया को बारम्बार उद्धृत करते हैं; उनकी भाषा दया के साहचर्य को स्पष्ट करती है।

Albert Barnes: परमेश्वर की स्वतंत्र सत्ता पर बल देते हैं कि दया और कृपा उसे नियंत्रित करती है, मनुष्यों के कर्म-स्वरूप नहीं।

Adam Clarke: इस वचन से धार्मिक चेतना प्राप्त होती है कि दया का अधिकार ईश्वर को ही है और मानव-योग्यता उसके निर्णय से निर्भर नहीं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

रोमियों 9:15 समानांतर पद और संबंधित वचन

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उसने कहा, “मैं तेरे सम्मुख होकर चलते हुए तुझे अपनी सारी भलाई* दिखाऊँगा, और तेरे सम्मुख यहोवा नाम का प्रचार करूँगा, और जिस पर मैं अनुग्रह करना चाहूँ उसी पर अनुग्रह करूँगा, और जिस पर दया करना चाहूँ उसी पर दया करूँगा।”

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रोमियों 9:18 (HINIRV) »
तो फिर, वह जिस पर चाहता है, उस पर दया करता है; और जिसे चाहता है, उसे कठोर कर देता है।

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इसलिए यह न तो चाहनेवाले की, न दौड़नेवाले की परन्तु दया करनेवाले परमेश्‍वर की बात है।

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