Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
रोमियों 9:1 रोमियों 9:2 रोमियों 9:3 रोमियों 9:4 रोमियों 9:5 रोमियों 9:6 रोमियों 9:7 रोमियों 9:8 रोमियों 9:9 रोमियों 9:10 रोमियों 9:11 रोमियों 9:12 रोमियों 9:13 रोमियों 9:14 रोमियों 9:15 रोमियों 9:16 रोमियों 9:17 रोमियों 9:18 रोमियों 9:19 रोमियों 9:20 रोमियों 9:21 रोमियों 9:22 रोमियों 9:23 रोमियों 9:24 रोमियों 9:25 रोमियों 9:26 रोमियों 9:27 रोमियों 9:28 रोमियों 9:29 रोमियों 9:30 रोमियों 9:31 रोमियों 9:32 रोमियों 9:33



मुख्य व्याख्यात्मक बिंदु
रोमियों 9:27 में पौलुस यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि ईश्वर की वफादारी और चुनाव का अर्थ यह नहीं कि सभी वंशानुगत यहूदी स्वचालित रूप से उद्धार पाएँगे; यहाँ भविष्यवाणी यह दर्शाती है कि केवल कुछ ही वास्तविक विश्वासित बने रहेंगे। यह कथन न्याय और दया के दिव्य संयोजन पर प्रकाश डालता है—परमेश्वर अपना वादा पूरा करेगा, परन्तु मानव उत्तरदेहिता और विश्वास का स्थान भी बना रहेगा।
साहित्यिक प्रसंग
यह पद रोमियों अध्याय 9 की तार्किक बहस का हिस्सा है, जहाँ पौलुस यहूदियों और धर्म के वादों के विषय पर सवाल उठाते हैं। पहले अयायों में वे यह स्पष्ट करते हैं कि परमेश्वर ने अब्राहम और उसके वंश को विशेष वादा दिया, किन्तु वह वादा सामान्य नस्लीय पहचान से नहीं बँधा रहता। यशायाह की उद्धरण-पंक्ति (यहेजा. 10:22–23 संदर्भ में) यहाँ यह बताती है कि बाह्यजनसंख्या बड़ी हो सकती है, पर वास्तविक चरण में भगवान के वादे के अनुरूप जो बचेंगे वे कम होंगे। तात्पर्य यह कि ईश्वर की योजना अंतिम रूप से उसकी इच्छा और दया पर आधारित है, पर धार्मिक वंश पर नहीं।
धार्मिक-दैवीय महत्व
यह पद दो मुख्य theological पहलुओं को जोड़ता है: प्रथम, परमेश्वर का वचन सच्चा और पूरा होगा—जो चुनाव से जुड़ा वादा है वह पूरी तरह नष्ट नहीं होगा। द्वितीय, मानव उत्तर और आस्था का स्थान स्पष्ट रहता है—आख़िरकार कुछ ही मनुष्य वह आध्यात्मिक गुण दिखाएँगे जो उद्धार का प्रमाण हैं। इससे यह अपेक्षा बनती है कि ईश्वर की दया और मनुष्य की जिम्मेदारी साथ-साथ समझी जाएँ।
शास्त्र से संबंध
मनन हेतु प्रश्न
1) क्या मैं धार्मिकता को मात्र वंशीय या परम्परागत विरासत मानता/मानती हूँ, या व्यक्तिगत विश्वास और जीवन-परिवर्तन पर ध्यान देता/देत?
2) परमेश्वर की चुनी हुई वफादारी और मेरे व्यक्तिगत उत्तर के बीच संतुलन कैसे बनता है?
3) यह पद मेरे समुदाय में न्याय और दया के व्यावहारिक व्यवहार को कैसे प्रभावित करता है?
क्रिटिकल उद्धरण
मैथ्यु हेनरी ने संक्षेप में कहा है: "चुनाव का अर्थ यह नहीं कि धर्म के दाग-अवशेष ही उद्धार की गारंटी हों" (संक्षिप्त उद्धरण)। अल्बर्ट बार्न्स का ध्यान इसी ओर था कि भविष्यवक्ता का आशय वास्तविक श्रद्धा के अभाव में सामूहिक सुरक्षा का अभाव दिखाना है।
संक्षेप निष्कर्ष
रोमियों 9:27 हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर के वादे और मानव उत्तर दूनों महत्वपूर्ण हैं। इतिहास में बड़ी परंपरा होने से स्वचालित उद्धार नहीं मिलता; वास्तविक उद्धार वह है जो विश्वास और आत्मिक सच्चाई से परख में टिके। पौलुस यशायाह के शब्दों का उपयोग कर यह चुनौती देते हैं कि ईश्वर अपने वादे निभाएगा परन्तु वे वादे आत्मिक जीवन में प्रकट होने चाहिए न कि केवल बाह्य वंशगत पहचान में।