Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
रोमियों 9:1 रोमियों 9:2 रोमियों 9:3 रोमियों 9:4 रोमियों 9:5 रोमियों 9:6 रोमियों 9:7 रोमियों 9:8 रोमियों 9:9 रोमियों 9:10 रोमियों 9:11 रोमियों 9:12 रोमियों 9:13 रोमियों 9:14 रोमियों 9:15 रोमियों 9:16 रोमियों 9:17 रोमियों 9:18 रोमियों 9:19 रोमियों 9:20 रोमियों 9:21 रोमियों 9:22 रोमियों 9:23 रोमियों 9:24 रोमियों 9:25 रोमियों 9:26 रोमियों 9:27 रोमियों 9:28 रोमियों 9:29 रोमियों 9:30 रोमियों 9:31 रोमियों 9:32 रोमियों 9:33



रोमियों 9:2 पर केंद्रित व्याख्या
मुख्य interpretive बिंदु: रोमियों 9:2 में पॉल का तीखा शोक उद्घोष इस बात को दर्शाता है कि परमेश्वर की योजना और मानवता की निर्भरता के बीच उद्भव होने वाले दिवालियापन से कैसे एक विश्वस्त नागरिक के दिल में गहरा पीड़ा उठती है। वे यह दिखाते हैं कि धार्मिक व्यवस्था के भीतर भी कई लोगों के लिए ईश्वर की कृपा और उद्धार की इच्छा खुली नहीं हो पाती, और यह चिंता न सिर्फ व्यक्तिगत, बल्कि समुदायगत स्तर पर भी गहराती है।
साहित्यिक प्रसंग (लिटरेरी/contextual)
इस पाठ को रोमियों के तृतीय से पंचम अध्याय के भीतर पॉल की चिंता और उद्धार के वैचारिक संघर्ष के रूप में समझना चाहिए। Romans 9-11 में पॉल यह दिखाते हैं कि परमेश्वर की चुनाव-योजना मानव उपकारों के कारण नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्रता औरiameter की इच्छा के अनुसार है। verse 2 में उनके दुर्बल-आमने-सामने खड़े शोक से यह स्पष्ट होता है कि उद्धार के मामले में इस समय इस्राइल के बहुतेरे सदस्य अभी ईमान में नहीं आये हैं, जबकि यह परमेश्वर की कृपा की पूर्णता के साथ जुड़ा है।
थियोलॉजिकल महत्व
पॉल का कहना कि “मुझे बड़ा शोक है, और मेरा मन सदा दुःखता रहता है,” उद्धार के सामान्य मानवीय अनुभव—व्यक्ति और समुदाय के बीच का विवेक-विरोध—को रेखांकित करता है। यह शोक ईमान की अस्वीकृति, प्रभु की योजना के विरोध, या समुदायीय अपहरण जैसी स्थितियों पर क्रोध नहीं, बल्कि एक संवेदनशील धार्मिक-आकांक्षा है जो परमेश्वर के न्याय और करुणा को साथ-साथ मानती है। सामान्य तात्पर्य यह है कि उद्धार के मार्ग में कुछ लोग डूबे रह जाते हैं, और यह ईश्वर-राज्य के विराट योजना के भीतर भी दुःखद है, परन्तु आशा की रोशनी अभी भी बनी रहती है कि कृपा और जागृति से परिवर्तन संभव है।
अन्य ग्रंथों के साथ संदर्भ
Reflection questions (विचार के questions)
संक्षिप्त निष्कर्ष
रोमियों 9:2 में पॉल का दिल का शोक उन प्रश्नों को प्रकाशमान करता है जो उद्धार प्रक्रिया की गहराई से जुड़ते हैं: यह आवाज़ मानवीय दुख को दिखाती है, पर यह भी संकेत देती है कि परमेश्वर की योजना और उसकी कृपा का लोभ हमें न हताश होने दें। समष्टि के लिए प्रार्थना और विश्वास—ये दो रास्ते हैं जिनके द्वारा उद्धार का प्रकाश फिर से चमक सकता है।
अनुचित उद्धरण (कथनों के exact quotes, यदि उपलब्ध)
Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक डोमेन टिप्पणीकारों से यदि उपलब्ध हो, तो यहाँ केवल वही संक्षेप रूप से उल्लेखित होंगे। फिलहाल इस पाठ के भीतर इन लेखकों के पूर्ण वाक्य उद्धरण सीधे उद्धृत नहीं किये गए हैं।