Old Testament
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जकर्याह 6:8 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
तब उसने मुझसे पुकारकर कहा, “देख, वे जो उत्तर के देश की ओर जाते हैं, उन्होंने वहाँ मेरे प्राण को ठण्डा किया है।”
जकर्याह 6:8 पद-दर-पद बाइबल टीका
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जकर्याह 6:8 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यहेजकेल 5:13 (HINIRV) »
“इस प्रकार से मेरा कोप शान्त होगा, और अपनी जलजलाहट उन पर पूरी रीति से भड़काकर मैं शान्ति पाऊँगा; और जब मैं अपनी जलजलाहट उन पर पूरी रीति से भड़का चुकूँ, तब वे जान लेंगे कि मुझ यहोवा ही ने जलन में आकर यह कहा है।

जकर्याह 1:15 (HINIRV) »
जो अन्य जातियाँ सुख से रहती हैं, उनसे मैं क्रोधित हूँ*; क्योंकि मैंने तो थोड़ा सा क्रोध किया था, परन्तु उन्होंने विपत्ति को बढ़ा दिया।

प्रकाशितवाक्य 18:21 (HINIRV) »
फिर एक बलवन्त स्वर्गदूत ने बड़ी चक्की के पाट के समान एक पत्थर उठाया, और यह कहकर समुद्र में फेंक दिया, “बड़ा नगर बाबेल ऐसे ही बड़े बल से गिराया जाएगा, और फिर कभी उसका पता न मिलेगा। (यिर्म. 51:63-64, यहे. 26:21)
जकर्याह 6:8—Verse in context
याखोश के बादलों में उद्धृत किया गया यह अवसर यह सिखाता है कि ईश्वर के कार्य और उनकी योजनाओं की दिशा-निर्देश कैसे मिलते हैं। यहाँ यह दृश्य है कि एक संदेशवाहक-नायकों के समूह को उत्तर की ओर भेजा गया है ताकि वे आगे बढ़कर कार्य करें, परन्तु उनका कदम किस दिशा में है, यह परमेश्वर ही निर्धारित करते हैं। इस verse में उत्तर देश की ओर जाने वाले व्यक्तियों के बारे में एक टिप्पणी है: वे “मेरे प्राण को ठण्डा किया है”—यानी ईश्वर की दृष्टि में उनके कर्मों की ठंडक, उनके आत्मिक स्थिति और प्रेरणा के बारे में एक चेतावनी या संकेत है।
केंद्रीय अर्थ
verse बताता है कि उत्तर देश की ओर जाने वाले लोग—जो परमेश्वर की योजना में भागीदारी चाहते थे—उन्होंने अपनी गतिविधियों से ईश्वर के प्रति श्रद्धा, उत्साह या लगन में जिसे आँका गया, उसे थोड़ा ठंडा कर दिया। इसका संदर्भ यह है कि ईश्वर अपने दूतों के माध्यम से नेतृत्व देता है, परन्तु मनुष्यों के अंदर की प्रेरणा भी निर्णायक हो सकती है। यहाँ “प्राण की ठंडक” शब्द का प्रयोग उन भावनात्मक या आध्यात्मिक उर्जा के घटने की ओर संकेत करता है जो उद्देश्य के स्पष्ट नहीं रहने पर बाधक बन सकती है।
दो-तीन प्रमुख विषय
संबद्ध पाठ
- यिर्मयाह 17:9: हृदय की गहराई आदर्श नहीं, बल्कि यह अपरिहार्य परिवर्तन की ज़रूरत को दर्शाता है;—हमारे भावनात्मक रुझान कब छलावे बन जाते हैं, यह विचारणीय है।
- मत्ती 28:19-20: यीशु की महानादेश ने हमें विश्व के अंश से जोड़ने के लिए बुलाया है; यह दर्शाता है कि दिशा सही हो तो प्रेरणा में नई ऊर्जा आ सकती है।
- रोम 12:11: उद्धारप्रिय जीवनशैली के लिए उत्साह और निष्ठा बनाए रखना कैसे उचित है, यह दिखाता है कि सेवकत्व का ठंडा होना कहाँ हानिकारक है।
व्यावहारिक विचार
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप में)
- यशायाह 40:31 के अनुसार, जो परमेश्वरे के भरोसे रहते हैं उनका हौंसला नया रहता है—साहस और निरन्तरता मिलती है।
- इब्र 10:24-25: एक-दूसरे के प्रोत्साहन से प्रेरक बने रहने का महत्व।
- जेकब 1:6-8: अनिश्चितता और ठहराव से बचने के लिए ईमानदार, प्रत्यक्ष विश्वास आवश्यक है।
संक्षिप्त समापन
जकर्याह 6:8 हमें याद दिलाता है कि ईश्वर के योजनागत पथ पर हमारा सक्रिय और दिल से नामित प्रयास महत्त्वपूर्ण है। उत्तर की ओर जाने वाले कर्मी कैसे ईश्वर के निर्देशन के अनुसार अपने उद्देश्य की दिशा निर्धारित करें, यह देखने के लिये यह verse एक चेतावनी के रूप में भी कार्य करता है: प्राण की ठंडक से बचकर, प्रार्थना, पवित्रता और समर्पण के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
योगदान के लिए आवश्यक स्मरण: यह पथदर्शी विचार सार्वजनिक-पूर्ववर्ती टिप्पणीकारों के दृष्टिकोणों के साथ बुना गया है ताकि एक संगठित, सरल और प्रायोगिक मार्ग उपलब्ध हो सके.