Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
1 कुरिन्थियों 3:1 1 कुरिन्थियों 3:2 1 कुरिन्थियों 3:3 1 कुरिन्थियों 3:4 1 कुरिन्थियों 3:5 1 कुरिन्थियों 3:6 1 कुरिन्थियों 3:7 1 कुरिन्थियों 3:8 1 कुरिन्थियों 3:9 1 कुरिन्थियों 3:10 1 कुरिन्थियों 3:11 1 कुरिन्थियों 3:12 1 कुरिन्थियों 3:13 1 कुरिन्थियों 3:14 1 कुरिन्थियों 3:15 1 कुरिन्थियों 3:16 1 कुरिन्थियों 3:17 1 कुरिन्थियों 3:18 1 कुरिन्थियों 3:19 1 कुरिन्थियों 3:20 1 कुरिन्थियों 3:21 1 कुरिन्थियों 3:22 1 कुरिन्थियों 3:23



मुख्य व्याख्या: प्रभु ज्ञानियों के विचार व्यर्थ हैं
1 कुरिन्थियों 3:20 से संकेत मिलता है कि परमेश्वर ज्ञानियों के विचारों को भी पहचानते हैं और उन्हें बेकार कहे जाते हैं। पवित्र वचन यह दिखाता है कि मानव बुद्धि कितनी भी उन्नत क्यों न हो, यदि वह प्रकृति-आधारित स्वार्थ या सीमित दृष्टिकोण के भीतर फँस जाए, तो वह प्रभु के सामने व्यर्थ है। शास्त्र शिक्षा देता है कि सच्ची समझ और उपयोगी ज्ञान वही है जो परमेश्वर के उद्देश्य, उसके योजना और पवित्र चरित्र के अनुरूप हो।
साहित्यिक संदर्भ के अंदर रास्ता
पद्य 3 अध्याय में पौलुस क्रिश्चियन समुदाय के बीच चल रहे विभाजन का परिचय देता है—कुछ प्रेरितों के अनुयायियों के पीछे भागते हैं, कुछ ज्ञानियों की प्रशंसा में लगे हैं। लेकिन परमेश्वर की दृष्टि में वास्तविक बुद्धि और ज्ञान यीशु मसीह में अभिव्यक्त होते हैं। “प्रभु ज्ञानियों के विचारों को जानता है, कि व्यर्थ हैं” यह कहकर वह बताता है कि मानवीय तर्क और धार्मिक-दुनिया के मूल्य अक्सर सीमित होते हैं जब वे क्रूस पर मरे हुए मसीह के साथ समन्वय नहीं पाते।
गूढ़ theological significance
यह प्रवचन बताता है कि समझदार होने का असली माप यह है कि क्या विचार और सिद्धांत परमेश्वर के मार्ग के अनुरूप जीवन में परिवर्तन लाते हैं। यदि ज्ञान उपहास, घमन या प्रतिस्पर्धा का स्रोत बन जाए, तो वह “व्यर्थ” है। परमेश्वर सच्ची बुद्धि को तब प्रकट करते हैं जब वे अपने राज में क्षमा, नम्रता, प्रेम और क्रूस की सत्ता के अनुरूप रहते हैं। इस दृष्टिकोण से हमें आत्म-उच्चारण छोड़कर मसीह के क्रूस की पवित्रता को केंद्र बनाकर सोचने की शिक्षा मिलती है।
पवित्र शास्त्र के अन्य संदर्भों के साथ संबंध
आत्म-चिन्तन के प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह वाक्य हमें याद दिलाता है कि वास्तविक ज्ञान वही है जो परमेश्वर के उद्देश्यों के अनुरूप भीतर-भीतर परिवर्तन लाए। ज्ञान की आड़ में pride या worldly rugby से बचते हुए, हमें मसीह के क्रूस की नम्रता और विश्वास-प्रधान जीवन को अपनाना चाहिए। भूले-भटके विचार भी परमेश्वर के दृष्टिकोण से अंततः व्यर्थ होते हैं; पर सच्चा ज्ञान, जो यीशु में और उसकी आजीवन प्रेरणा में है, जीवन का मार्ग बन जाता है।
Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के संक्षिप्त उद्धरण (जहाँ संभव)
यह टिप्पणी सार्वजनिक-डायरेक्ट उद्धरणों के लिए तैयार है; जहाँ उपलब्ध हो, नीचे संक्षेप में संदर्भित है:
उद्धरण-उल्लेख: Matthew Henry ने सांसारिक ज्ञान के स्थान पर क्रूस पर मसीह की महिमा पर बल दिया है; Albert Barnes ने कहा कि ईश्वर की बुद्धि निर्धारित करती है कि विश्व की ज्ञान-राशि कहाँ तक वास्तविक लाभ देती है; Adam Clarke ने भी क्रूस की सत्यान्वेषण को ज्ञान के उच्चतम माप के रूप में प्रस्तुत किया है।
उद्धरण-चिन्हित पंक्ति: “प्रभु ज्ञानियों के विचारों को जानता है, कि व्यर्थ हैं।” (यह वाक्य पंक्ति के सार को संरक्षित करता है।)