Old Testament
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1 कुरिन्थियों 7:1 1 कुरिन्थियों 7:2 1 कुरिन्थियों 7:3 1 कुरिन्थियों 7:4 1 कुरिन्थियों 7:5 1 कुरिन्थियों 7:6 1 कुरिन्थियों 7:7 1 कुरिन्थियों 7:8 1 कुरिन्थियों 7:9 1 कुरिन्थियों 7:10 1 कुरिन्थियों 7:11 1 कुरिन्थियों 7:12 1 कुरिन्थियों 7:13 1 कुरिन्थियों 7:14 1 कुरिन्थियों 7:15 1 कुरिन्थियों 7:16 1 कुरिन्थियों 7:17 1 कुरिन्थियों 7:18 1 कुरिन्थियों 7:19 1 कुरिन्थियों 7:20 1 कुरिन्थियों 7:21 1 कुरिन्थियों 7:22 1 कुरिन्थियों 7:23 1 कुरिन्थियों 7:24 1 कुरिन्थियों 7:25 1 कुरिन्थियों 7:26 1 कुरिन्थियों 7:27 1 कुरिन्थियों 7:28 1 कुरिन्थियों 7:29 1 कुरिन्थियों 7:30 1 कुरिन्थियों 7:31 1 कुरिन्थियों 7:32 1 कुरिन्थियों 7:33 1 कुरिन्थियों 7:34 1 कुरिन्थियों 7:35 1 कुरिन्थियों 7:36 1 कुरिन्थियों 7:37 1 कुरिन्थियों 7:38 1 कुरिन्थियों 7:39 1 कुरिन्थियों 7:40



1 कुरिन्थियों 7:34 – एक विचारणीय तुलना विवाहिता और अविवाहिता के बीच
पद 34 में पवित्र प्रेरित पौलुस इस Corinthians समुदाय के भीतर दम्पती जीवन की विविध परिस्थितियों को व्यवस्थित करते हैं। वह विवाह के साथ आए सामाजिक दबावों, पारिवारिक दायत्वों और धार्मिक समर्पण के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता को उजागर करते हैं। अविवाहित स्त्री के लिए वह प्रभु की चिन्ता को प्राथमिक मानते हैं—यानी देह और आत्मा दोनों पवित्र रहें—जबकि विवाहिता के लिए संसारिक दायित्व और पति के साथ जीवन की जिम्मेदारियाँ प्रमुख बन जाती हैं। इसका निष्कर्ष है कि जीवन की स्थिति चाहे जो हो, परमेश्वर के truths के साथ ईमानदारी और पवित्रता बनाए रखना लक्ष्य होना चाहिए।
मुख्य अर्थ
पौलुस यह स्पष्ट करते हैं कि विवाह स्थिति में व्यक्ति का ध्यान एक विशेष प्रकार की “चिन्ता” पर टिकता है—जिनमें अविवाहित पर प्रभु की आत्म-निर्भरता और पवित्रता की चिंता है, जबकि विवाहित पर संसारिक और पारिवारिक दायित्वों की भूमिका अधिक स्पष्ट होती है। यह एक आंतरिक भिन्नता है, न कि मूल्य की विपरीतता। उद्देश्य समान है: हर स्थिति में ईश्वर के साथ एक समर्पित जीवन।
तीन प्रमुख विचार
संबंधित बाइबिल संदर्भ
इन विचारों को अन्य NT पाठों से भी प्रेरणा मिलती है:
व्यावहारिक विचार
आज के पाठक के लिए यह संदेश एक संतुलन बनाता है—जो जहां भी रहे, अपनी अंतरात्मा की श्रद्धा को बनाए रखें, और कर्तव्य के साथ परमेश्वर की इच्छा को प्रमुख मानें। अविवाहित हों या विवाहित, ईश्वर के राज्य के लिए जीवन की दिशा को केंद्रित रखें: सेवकाई, नम्रता, और प्रेम—ये दोनों स्थितियों में समान रूप से चुने जा सकते हैं।
संक्षिप्त निष्कर्ष
1 कुरिन्थियों 7:34 यह बताता है कि विवाह और अविवाह दोनों के अपने-अपने दायित्व हैं, पर दोनों में परमेश्वर की पवित्रता और समर्पण केन्द्र में रहते हैं। अविवाहित के लिए प्रभु की चिन्ता—देह और आत्मा दोनों में पवित्रता—उच्चतम लक्ष्य है; विवाहित के लिए संसारिक दायित्व भी मान्य हैं, पर उनका सही क्रम और परमेश्वर के भय में समर्पण बना रहना चाहिए।
क आपसी संदर्भ
नोट: यदि आप चाहें तो यह पाठ Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke की धारणा-रेखाओं से संक्षेप में मिलकर समझना चाहेंगे; नीचे मुख्य बिंदु उनके संकल्प के सार को समाहित करता है:
Matthew Henry: अविवाहित जीवन की स्वतंत्रता और परमेश्वर के राज्य के मद्देनज़र पवित्रता का महत्व।
Albert Barnes: विवाह और अविवाह रूपी दायित्वों के बीच संतुलन—हर स्थिति में ईश्वर की इच्छा को प्राथमिकता।
Adam Clarke: मनुष्य के भीतर आत्मिक और सामाजिक जीवन के दो आयामों की समान महत्ता; पवित्रता में स्थिरता आवश्यक।