Old Testament
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2 राजाओं 22:18 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
परन्तु यहूदा का राजा जिस ने तुम्हें यहोवा से पूछने को भेजा है उससे तुम यह कहो, कि इस्राएल का परमेश्वर यहोवा कहता है,
2 राजाओं 22:18 पद-दर-पद बाइबल टीका
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2 राजाओं 22:18 समानांतर पद और संबंधित वचन
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2 इतिहास 34:26 (HINIRV) »
परन्तु यहूदा का राजा जिसने तुम्हें यहोवा से पूछने को भेज दिया है उससे तुम यों कहो, कि इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यह कहता है,

यशायाह 3:10 (HINIRV) »
धर्मियों से कहो कि उनका भला होगा, क्योंकि वे अपने कामों का फल प्राप्त करेंगे।

मलाकी 3:16 (HINIRV) »
तब यहोवा का भय माननेवालों ने आपस में बातें की, और यहोवा ध्यान धरकर उनकी सुनता था; और जो यहोवा का भय मानते और उसके नाम का सम्मान करते थे, उनके स्मरण के निमित्त उसके सामने एक पुस्तक लिखी जाती थी।
सीधे अर्थ का सार
यह पद कहता है कि यहूदा का राजा जिसे यहोवा से पूछने के लिए भेजा गया है, उसे संदेश दें: “इस्राएल का परमेश्वर यहोवा कहता है।” शास्त्रार्थ में यह संकेत करता है कि राजा अपने निर्णय में परमेश्वर की 명सार पर निर्भर था और नीतिगत निर्णयों के लिए परमेश्वर से मार्गदर्शन माँगना चाहिए।
संदर्भ-सार
2 राजाओं 22:18 भाग जो प्रभु के अभिमुख नियमों और राज्य के आचार-व्यवहार पर केंद्रित है, यह दर्शाता है कि राजा का कर्तव्य है कि वह यहोवा से पूछे बिना कोई उपाय न करे। इतिहासिक पृष्ठभूमि में, यहूदा के राजा योराम या अन्य समकालीन राजाओं के समय में केपालन और फॉलो-अप कदमों का संदर्भ जुड़ा है, जब वे मंदिर के पथप्रदर्शनों के अनुसार डगर तय करते थे।
व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ
- यहोवा से पूछना: धार्मिक-राजनीतिक निर्णय में यह एक ढाँचा स्थापित करता है कि जनता के नेता यहोवा की इच्छा को प्राथमिकता दें। यह संदेश विरोधाभास से मुक्त रहने की तरफ इशारा करता है—यानी स्वार्थ-योजना नहीं, बल्कि परमेश्वर की योजना।
- संदेश का स्वरूप: प्राप्त निर्देश एक न बिगड़ने वाला आदेश है, जो यह बताता है कि राजा और उसका जटिल प्रशासन यहोवा के मार्गदर्शन के भीतर काम करे।
- प्रभाव: यदि राजा यहोवा से पूछे बगैर निर्णय लेता है, तो नीति-निर्माण में गलतियाँ और राज्य की आस्थाओं पर आघात संभव होते।
कुंजी सूक्तियाँ (छोटे संदर्भ) और उनके विचार
परोक्ष क्रॉस-रेफरेंसेस
- निर्भरता पर जोर: यशायाह 30:21 और व्यवस्थय 17:8-11 की तरह मूल परमात्मा के मार्गदर्शन का स्मरण कराते हैं कि नेता कैसे सतर्क रहें और परमेश्वर की प्यास बुझाने की कोशिश करें।
- प्रामाणिकता की कसौटी: इतिहास में राजाओं के कदम परिणामभूत होते रहे; यह संदर्भ दर्शाता है कि परमेश्वर के निर्देशों के बिना शक्ति का प्रयोग कितना जोखिम भरा हो सकता है।
नोट: ऊपर के क्रॉस-रेफरेंसेस केवल विषय-संयोजन के लिए हैं; पूर्ण पद-ग्रंथ उल्लिखित नहीं किया गया है।
संक्षिप्त व्यवहारिक निष्कर्ष
कहानी से सीख यह है कि संकट-समय में भी नेतृत्व को आत्म-स्वतंत्रता के बजाय परमेश्वर की योजना के अनुरूप चलना चाहिए। हृदय से पूछना, स्पष्ट और सत्यापित मार्गदर्शन मिलना, और जनता के कल्याण को सर्वोच्च मानना—यही दिशा-निर्देश होने चाहिए।
टिप्पणीकारों के संक्षेप्यों से प्रेरित सार
मार्थ्यू हेनरी, ऍलबर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के सार्वजनिक-domain टिप्पणियों में यह विचार आता है कि परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना राजा-नीतियाँ ध्वस्त हो सकती हैं; उनके शब्दों से यह प्रेरणा मिलती है कि राजनीति और भक्तिपूर्ण नेतृत्व का स्वस्थ संतुलन चाहिए। (कृपया ध्यान दें: नीचे उद्धृत संक्षिप्त पंक्तियाँ केवल संदर्भ के लिए हैं और पूर्ण पाठ नहीं हैं।)
संक्षेप उद्धरण: “राजा को यहोवा से पूछना चाहिए”—यह सरल, स्पष्ट निर्देश है जो नीति और आचरण दोनों में एक साथ सत्यता लाता है।