Old Testament
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2 राजाओं 22:16 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
'यहोवा यह कहता है, कि सुन, जिस पुस्तक को यहूदा के राजा ने पढ़ा है, उसकी सब बातों के अनुसार मैं इस स्थान और इसके निवासियों पर विपत्ति डालने पर हूँ।
2 राजाओं 22:16 पद-दर-पद बाइबल टीका
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2 राजाओं 22:16 समानांतर पद और संबंधित वचन
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दानिय्येल 9:11 (HINIRV) »
वरन् सब इस्राएलियों ने तेरी व्यवस्था का उल्लंघन किया, और ऐसे हट गए कि तेरी नहीं सुनी। इस कारण जिस श्राप की चर्चा परमेश्वर के दास मूसा की व्यवस्था में लिखी हुई है, वह श्राप हम पर घट गया, क्योंकि हमने उसके विरुद्ध पाप किया है।

यहोशू 23:15 (HINIRV) »
तो जैसे तुम्हारे परमेश्वर यहोवा की कही हुई सब भलाई की बातें तुम पर घटी हैं, वैसे ही यहोवा विपत्ति की सब बातें भी तुम पर लाएगा और तुम को इस अच्छी भूमि के ऊपर से, जिसे तुम्हारे परमेश्वर यहोवा ने तुम्हें दिया है, सत्यानाश कर डालेगा।

व्यवस्थाविवरण 29:18 (HINIRV) »
इसलिए ऐसा न हो, कि तुम लोगों में ऐसा कोई पुरुष, या स्त्री, या कुल, या गोत्र के लोग हों जिनका मन आज हमारे परमेश्वर यहोवा से फिर जाए, और वे जाकर उन जातियों के देवताओं की उपासना करें; फिर ऐसा न हो कि तुम्हारे मध्य ऐसी कोई जड़ हो, जिससे विष या कड़वा फल निकले, (प्रेरि. 8:23)
सीधे अर्थ की धारा
2 राजाओं 22:16 में यहोवा कहता है कि यहूदा के राजा द्वारा पढ़ी गई पुस्तक की बातों के अनुरूप, मैं इस स्थान और इसके निवासियों पर विपत्ति लाने पर हूँ। अर्थात् जो अधिकारीगण ने शासनकाल में शास्त्र के निर्देशों को न मानकर अपराध किया, उनके कारण परमेश्वर ने विरुद्ध कदम उठाने की चेतावनी दी है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
युद्ध-युग के बाद जो अहबकीय शासन चला, उसके अंत में यहूदा के राजा ने एक पुरानी पुस्तक खोलकर पढ़ी—संभावित रूप से विधि-ग्रंथ (Torah) का संकलन—जिसमें देश के भूराग्रस्त आचार-विचार और मंदिर-उल्लंघन के बारे में चेतावनियाँ दर्ज थीं। यह पढ़कर राजा ने तुरंत त्रुटियों पर उपाय करने के लिए किया, और यहीं से वाचा-आग्रह का संदेश उभरकर आता है कि यदि लोग परमेश्वर के नियमों से हटते हैं, तो परिणाम अनिवार्य विपत्ति होगा।
पूर्वबोध और व्याख्या
यहाँ एक महत्वपूर्ण बिंदु है: शास्त्र के पठन से चरित्र-परिवर्तन की उम्मीद। राजा ने पढ़कर यह स्वीकार किया कि बाबत-विपत्ति उनके अपने व्यवहार के कारण है, न कि केवल बाहरी घटनाओं के कारण। इसका तात्पर्य यह है कि परमेश्वर अपने लोगों के नैतिक निर्णयों के अनुसार क्रिया-प्रतिक्रिया देता है; यदि राष्ट्र शास्त्र के मार्ग को नहीं मानता, तो उसका भाग्य सामान्यतः दंड-योग्य होता है।
थीमेटिक सार
अनुसंधानात्मक cross-references (संयुक्त समझ हेतु)
- वही विचार: राजाओं के समय में राष्ट्र के व्यवहार के अनुसार ईश्वर की डाँट और करहम; संदर्भ: 2 राजाओं 17-18 (जो पाठशाला के अनुसार आचरण के परिणाम दिखाते हैं)। விள
- समझ का सूत्र: यीशु के संदेश के साथ तुलना—लोक-उद्धार के लिए बाहर से नहीं, अंतःकरण से परिवर्तन आवश्यक है; संदर्भ: व्यभिघतियों के बारे में यशायाह/यूहन्ना में आभ्यास।
- प्रत्यक्ष प्रकरण: यदि लोग शास्त्र को मानते हैं, तो दया और सुधार संभव है; संदर्भ: 2 इतिहास 34-35 में यूक्त उदाहरण।
संकेत व practical takeaway
कथन कहता है: पवित्र वचनों के अनुसार जीवन जीना ही विपत्ति से सुरक्षा की दिशा है। पाठक समझे कि हमारे व्यक्तिगत आचरण और एक राष्ट्र के नैतिक दिशा-निर्देशन कितने घनिष्ठ हैं। शास्त्र के अध्ययन से अगर मन परिवर्तन होता है और हम परमेश्वर के मार्ग पर चलते हैं, तो विपत्ति केवल दंड नहीं, बल्कि सुधार का अवसर बनता है।
पक्का निष्कर्ष
जो लोग परमेश्वर के नियमों को सुनते और मानते हैं, वे अपनी गल्तियों को पहचानकर फिर से सही मार्ग पर आ जाते हैं। इसलिए यह verse हमें स्मरण कराता है कि ज्ञान केवल सूचना नहीं है, वह जीवन-परिवर्तन का मार्गदर्शक बनता है।
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