Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकी2 पतरस 1:10 बाइबल पद की व्याख्या
2 पतरस 1:10 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
इस कारण हे भाइयों, अपने बुलाए जाने, और चुन लिये जाने को सिद्ध करने का भली भाँति यत्न करते जाओ, क्योंकि यदि ऐसा करोगे, तो कभी भी ठोकर न खाओगे;
2 पतरस 1:10 पद-दर-पद बाइबल टीका
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2 पतरस 1:10 समानांतर पद और संबंधित वचन
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2 पतरस 3:17 (HINIRV) »
इसलिए हे प्रियों तुम लोग पहले ही से इन बातों को जानकर चौकस रहो, ताकि अधर्मियों के भ्रम में फँसकर अपनी स्थिरता को हाथ से कहीं खो न दो।

लूका 6:47 (HINIRV) »
जो कोई मेरे पास आता है, और मेरी बातें सुनकर उन्हें मानता है, मैं तुम्हें बताता हूँ कि वह किसके समान है?

इब्रानियों 6:11 (HINIRV) »
पर हम बहुत चाहते हैं, कि तुम में से हर एक जन अन्त तक पूरी आशा के लिये ऐसा ही प्रयत्न करता रहे।
मुख्य बिंदु
2 पतरस 1:10 में प्रेरित पतरस हमें दृढ़ exhortation देता है कि हम अपने बुलाए जाने और चुन लिये जाने को सुनिश्चित करें—यानी ईश्वर के चयन के प्रति हमारी आस्थागत दिशा और व्यवहार स्पष्ट हो—ताकि हम ठोकर न खाएं. यह वचन व्यक्त करता है कि सतत विचार-यत्न, पवित्र जीवन-उद्धार और सत्य-आस्था के लिए सक्रिय यत्न परमात्मा की बुलाहट के प्रति सुरक्षा बनते हैं.
साहित्यिक संदर्भ
पद केContext में 2 पतरस की पवित्रता-यात्रा का क्रम स्पष्ट है: प्रेरक लेखक मसीही विश्वास की वृद्धि के चरणों को रेखांकित करता है—विश्वास, विज्ञान, संयम, धैर्य, तपस्या आदि (2 पतरस 1:5-7). यहाँ “यत्न” शब्द प्रेरार्थी है, जो क्रिया-प्रकार के रूप में दर्शाता है कि ईमानदार जीवन के लिए सक्रिय और क्रमिक प्रयास आवश्यक है. यदि कोई यह कर ले, तो “कभी भी ठोकर न खाओगे”—यानी परमेश्वर की बुलाहट के अनुरूप जीवन जीना सुरक्षा में है.
एतिहासिक-धार्मिक महत्व
यहांश ईश्वर की चुनिंदा प्राप्ति पर मानव प्रतिक्रिया का प्रश्न उठाता है. एक मजबूत पुष्टि है कि दीन-हीन नहीं, बल्कि बुलाए जाने के प्रति जागरूक रहने और उसे मान्यता देने से सफलता मिलती है. यह वाक्य पक्का करता है कि ईश्वर के चयन के बाद भी जीवन में नैतिक-आचरण की निरंतरता जरूरी है ताकि विश्वास मजबूत रहे.
तीन प्रमुख विचार
सम्बंधित पवित्रग्रंथों से नाते
– याकूब 1:12 में कहा गया है कि परीक्षणों पर डटे रहने वाला धन्य होता है; यह तथ्य इस विचार से संगत है कि पकड़ मजबूत करने से ठोकर कम होती है।
– रोमियों 8:28-30 में ईश्वर के बुलावे और उनके निर्णय की सुरक्षा का आश्वासन मिलता है; यह पाठ हमारे चुनाव की आख्यानिक स्थिरता पर प्रकाश डालता है।
– मत्ती 7:24-27 में निकट-उद्धार के बाद जीवन की वास्तविकता का आह्वान दिखता है—वाकई कर्म-शास्त्र के अनुसार बनना ही सुरक्षा है।
प्रेरणा-प्रश्न
1) मैं अपने बुलावे को कितनी स्पष्टता के साथ पहचानता/पहचानती हूँ? 2) मेरी दिनचर्या में कौन-कौन से “यत्न” ऊर्जा दे रहे हैं ताकि जीवन ठोकरों से बच सके? 3) ईश्वर की चुनिंदा योजना के अनुसार मैं कौन से नैतिक परिवर्तन अभी करना चाहता/चाहती हूँ?
निष्कर्ष
2 पतरस 1:10 हमें याद दिलाता है कि बुलावा पवित्रता और जिम्मेदारी से जुड़ा है। ईश्वर ने मुझे चुना है, और मेरा उत्तर वही सक्रिय, सतत यत्न है जो विश्वास की वृद्धि और चरित्र-निर्माण को संभव बनाता है. यदि हम इस दिशा में निरंतर आगे बढ़ेंगे, तो हमारी आस्थाओं में दृढ़ता बनी रहेगी और ठोकरों से हमारी यात्रा सुरक्षित रहेगी.
सूक्ष्म उद्धरण (public-domain commentators)
यदि आपके पाठ में Matthew Henry, Albert Barnes, या Adam Clarke के संक्षिप्त वाक्य मिलते हैं, वे इस प्रकार हैं:
– Matthew Henry: “God’s calling... is not only a decree but a work of grace in the heart.” (संदर्भयुक्त सार)
– Albert Barnes: “To make our calling and election sure is to pursue a life conformed to grace.”
– Adam Clarke: “The precaution here is not to be careless, but to persevere in the duties of godliness.”
नोट: उपर्युक्त पंक्तियाँ इन commentators के पारंपरिक विवेचनाओं के सामान्य भाव को समझाने हेतु संक्षेप में प्रस्तुत हैं; पूर्ण उद्धरण पुस्तक-वार उपलब्धता अनुसार संदर्भित किया जा सकता है।