Old Testament
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2 पतरस 2:20 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
और जब वे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह की पहचान के द्वारा संसार की नाना प्रकार की अशुद्धता से बच निकले, और फिर उनमें फँसकर हार गए, तो उनकी पिछली दशा पहली से भी बुरी हो गई है।
2 पतरस 2:20 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
2 पतरस 2:20 समानांतर पद और संबंधित वचन
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इब्रानियों 10:26 (HINIRV) »
क्योंकि सच्चाई की पहचान प्राप्त करने के बाद यदि हम जान-बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं।

इब्रानियों 6:4 (HINIRV) »
क्योंकि जिन्होंने एक बार ज्योति पाई है, और जो स्वर्गीय वरदान का स्वाद चख चुके हैं और पवित्र आत्मा के भागी हो गए हैं,

फिलिप्पियों 3:19 (HINIRV) »
उनका अन्त विनाश है, उनका ईश्वर पेट है, वे अपनी लज्जा की बातों पर घमण्ड करते हैं, और पृथ्वी की वस्तुओं पर मन लगाए रहते हैं*।
कथन का सीधा अर्थ
2 पतरस 2:20 में कहा गया है कि जो लोग प्रभु यीशु मसीह के पहचान से संसार की अशुद्धताओं से निकल कर बच निकलते हैं, पर फिर बदले में वे उन अशुद्धताओं में फँसकर हार जाते हैं, उनकी दशा पहली से भी बुरी हो गई है। इसका तात्पर्य यह है कि उद्धार का बहुमूल्य अनुभव पाने के बाद भी यदि वे सचमुच आराधना को छोड़ दें या पाप के साथ लौट आएं तो उनका स्थिति और अधिक गम्भीर हो जाती है।
पृष्ठभूमि और अर्थ-संदर्भ
पद 2 पतरस के संदर्भ में लेखक अति भ्रष्ट और तरीके से बहकाने वाले शिक्षकों की चेतावनी दे रहा है। नये नियम के अनुयायियों के बीच दो प्रकार के खतरे दिखते हैं: बाह्य अशुद्धता से बच निकलना, फिर भी आन्तरिक बुराई की ओर पलटना; और जो व्यक्ति प्रत्यक्ष उद्धार पाने के बाद भी पाप के आकर्षण में लौट आता है, उसका परिणाम उस स्थिति से भी खराब हो सकता है जिसमें उसने कभी अनुभव किया था। यह शब्द हमारा ध्यान इस बात की ओर खींचते हैं कि उद्धार केवल एक बार की घटना नहीं, बल्कि जीवन-परिरक्षण की प्रक्रिया है जिसमें सतत विश्वास, जवाबदेही और पवित्र जीवन की लगन आवश्यक है।
व्याख्यात्मक दृष्टिकोण
- उद्धार की पहचान: ईश्वर के साथ सत्यपूर्ण संबंध को मानना और उसे दिनचर्या में जीवन भर बनाए रखना।
- अशुद्धताओं से निकासी: संसार की शपथ, लोभ, और अन्य गलतताओं से दूर रहने की सामर्थ्य पलायन नहीं, बल्कि आशीर्वाद से मिली कृपा है।
- वापस गिरना: यदि एक व्यक्ति पुनः उन अशुद्धताओं में लौटे, तो उसका गिरना न केवल प्रारम्भिक स्थिति पर लौटना है, बल्कि उसे ऐसा अनुभव भी हो सकता है जैसा उसने पहले कभी अनुभव नहीं किया था।
हाईलाइटेड कॉमन-थीम
अनुचित प्रतीक-योग और क्रॉस-रेफरेंस
कथन में यह दृश्य है कि किस प्रकार एक व्यक्ति जो उद्धार के अनुभव के पश्चात भी प्रलोभनों में फँसता है, उसकी स्थिति सुधर नहीं पाती। नीचे दिए संदर्भ विचारार्थ हैं:
संलग्ननापूर्ण संदर्भ
- उत्पत्ति 4:7 के समान, पाप की जड़ को दबाने के लिए सतत वफादारी और नियंत्रण की आवश्यकता पर बल देता है।
- यूहन्ना 15:5-6 के विचार, जिसमें निर्बल रहने पर प्रभु से जुड़ने की महत्ता बताई जाती है।
- गालातियों 5:22-23 के फलों की तुलना, ताकि जीवित विश्वास के साथ मार्गदर्शन स्पष्ट हो।
व्यावहारिक निष्कर्ष
- उद्धार अनुभव के बाद भी ईमानदारी से आत्म-निरीक्षण करें; क्या जीवन में पवित्रता और विश्वास वास्तव में बढ़ रहे हैं?
- कमजोर क्षणों में प्रार्थना, साहचर्य-समूह और पवित्रशास्त्र की പഠना बनाए रखें ताकि प्रतिशोध में गिरना रोक सके।
नोट: नीचे उद्धार-अनुभव और गिरावट की चेतावनी के समेकित विचार Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणियों से प्रेरित हैं:
“जो व्यक्ति प्रभु के नाम से निकट आता है, उसे संसार की अशुद्धताओं से निकलना चाहिए; पर यदि वह फिर उन ही आड़ में फँस जाए, तो उसकी दशा पहले से अधिक बुरी हो जाती है।” — Adams Clarke से सामान्य व्याख्या के अनुरूप सार
“धर्म के पथ पर चलते समय रहते-रहते खतरे हैं; गिरावट तब ही आती है जब आत्मा प्रभु के उद्धार-आधार से दूर हो जाती है।” — Matthew Henry अंदाज
“खबरदार रहना चाहिए कि उद्धार-सबक कुछ भी नहीं जब व्यक्ति फिर से पुराने पापों के जंजाल में फँस जाए।” — Albert Barnes के शब्द-सार