Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
निर्गमन 1 निर्गमन 2 निर्गमन 3 निर्गमन 4 निर्गमन 5 निर्गमन 6 निर्गमन 7 निर्गमन 8 निर्गमन 9 निर्गमन 10 निर्गमन 11 निर्गमन 12 निर्गमन 13 निर्गमन 14 निर्गमन 15 निर्गमन 16 निर्गमन 17 निर्गमन 18 निर्गमन 19 निर्गमन 20 निर्गमन 21 निर्गमन 22 निर्गमन 23 निर्गमन 24 निर्गमन 25 निर्गमन 26 निर्गमन 27 निर्गमन 28 निर्गमन 29 निर्गमन 30 निर्गमन 31 निर्गमन 32 निर्गमन 33 निर्गमन 34 निर्गमन 35 निर्गमन 36 निर्गमन 37 निर्गमन 38 निर्गमन 39 निर्गमन 40



निर्गमन 5:2 का महत्व और संदर्भ
फिरौन का यह प्रश्न विशिष्ट रूप से यह दिखाता है कि ईश्वर के नाम और वचन की वास्तविकता पर मानवीय स्वार्थ और दया-नर्मी दोनों का परीक्षण होता है। इस verse में न सिर्फ एक शासक का अड़ियल अवहेलना है, बल्कि यह भी रेखांकित होता है कि पृथ्वी पर सत्ता क्यों और कैसे परमेश्वर के उद्देश्य के सामने चैलेंज बनती है। यह संदेश पाठकों को यह याद दिलाता है कि विश्वास-प्रेरित आशीर्वाद और दया तब तक संभव नहीं जब तक मानव अज्ञान या भय के कारण ईश्वर के स्वामित्व को नहीं मानते।
मूल सन्दर्भ और लेखक की मनःस्थिति
यह पाठ पिता-स्वामी फ़िरौन के समय की कथा है जब इस्राएलियों को मिस्र से निकालने का परमेश्वर का उद्देश्य स्पष्ट हुआ। फिरौन का उत्तर दिखाता है कि वह იცहाई नहीं चाहता कि यहोवा के आदेश से यह्राएलियों को जाने दें; उसका उद्देश्य सत्ता-स्वायत्तता बनाम परमेश्वर की सत्ता के बीच संघर्ष है। यह दृश्य यह भी बताता है कि परमेश्वर की बुलाहट कितनी बार मानव के आत्म-गौरव और राजनीतिक हितों के सामने चुनौती बनती है।
मुख्य संदेश
इस verse का केंद्र बिंदु है: सत्य यह है कि परमेश्वर के नाम, उसकी सत्ता और उसकी आज्ञाओं को नहीं मानना, मानव-निर्मित योजनाओं को प्राथमिकता देता है। फिरौन कहता है कि वह “यहोवा को नहीं जानता” और इसीलिए यहूदियों को जाने नहीं देता। बातें स्पष्ट करती हैं कि ईश्वर के निश्चय के सामने मानव-स्वायत्तता वास्तविकता नहीं बनती; ईश्वर के उद्देश्य के आगे सभी मानवीय नीति-नियोजन निर्थक हो जाते हैं।
संदर्भ-विचार और विषयगत शाश्वत सिद्धांत
उद्धरणीय cross-references
ये संदर्भ इस प्राथमिक विचार-विमर्श को और स्पष्ट करते हैं:
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि मानव सत्ता कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, परमेश्वर की योजना से उसकी सहायता या बाधा नहीं हो पाती जब तक विश्वास में नहीं जुड़ता।
पठन-योग्य संदेश का संक्षेप
फिरौन का उत्तर एक चेतावनी है कि यीशु-युग से पहले भी परमेश्वर की सत्ता-स्वीकृति जीवन-यात्रा का आवश्यक हिस्सा रही है। अगर हम अपने समय और संसाधनों को परमेश्वर के उद्देश्य के अनुरूप समायोजित नहीं करते, तो रह-रह कर वह हमारे मार्गों को रोक सकता है।
आध्यात्मिक अभ्यास और निर्मल ध्यान
इस verse के साथ Pray-prompt: परमेश्वर, मुझे अपने नाम की व्यापकता और सत्ता को समझने दें; मेरे निर्णय, मेरे राजनीतिक या व्यावसायिक लाभ से ऊपर आपकी इच्छा पर योग्य बनें। मैं आपकी पहचान को स्वीकार कर आपके निर्देशों के साथ चलना चाहता हूँ।
हवा-स्वर: इस टिप्पणी में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन अभिलेखों से कुछ विचार के संकेत स्वाभाविक रूप से सम्मिश्रित हैं, परंतु इन पंक्तियों में उनके पूर्ण उद्धरण नहीं हैं।
उद्धरण के लिए यहां संक्षेप है: Henry, Barnes और Clarke के मौखिक भावों के आधार पर ईश्वर-प्रभुता की अवहेलना पर निबंधित विवेचना प्रस्तुत है।
संदर्भ: निर्गमन 5:2 के अनुसार, फिरौन की प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि मानवीय सत्ता तब तक स्थिर नहीं रहती जब तक वह परमेश्वर की पहचान और आज्ञाओं को नहीं मानती।