Old Testament
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यहेजकेल 1 यहेजकेल 2 यहेजकेल 3 यहेजकेल 4 यहेजकेल 5 यहेजकेल 6 यहेजकेल 7 यहेजकेल 8 यहेजकेल 9 यहेजकेल 10 यहेजकेल 11 यहेजकेल 12 यहेजकेल 13 यहेजकेल 14 यहेजकेल 15 यहेजकेल 16 यहेजकेल 17 यहेजकेल 18 यहेजकेल 19 यहेजकेल 20 यहेजकेल 21 यहेजकेल 22 यहेजकेल 23 यहेजकेल 24 यहेजकेल 25 यहेजकेल 26 यहेजकेल 27 यहेजकेल 28 यहेजकेल 29 यहेजकेल 30 यहेजकेल 31 यहेजकेल 32 यहेजकेल 33 यहेजकेल 34 यहेजकेल 35 यहेजकेल 36 यहेजकेल 37 यहेजकेल 38 यहेजकेल 39 यहेजकेल 40 यहेजकेल 41 यहेजकेल 42 यहेजकेल 43 यहेजकेल 44 यहेजकेल 45 यहेजकेल 46 यहेजकेल 47 यहेजकेल 48



यहेजकेल 29:3 पर टिप्पणी — संदर्भ और अर्थ
यहोया परमेश्वर यहोवा मिस्र के राजा फ़िरौन और मिस्र के बड़े नगर पर अपने आदेश का संकेत दे रहा है। यह पद यहूदियों को बाबुल के समय की करुण स्थिति के बीच दिए गए दायित्व और प्रभु के अधिकार का स्मरण कराता है। मिस्र एक शक्तिशाली राज्य था, पर परमेश्वर की दृष्टि में उसकी शक्ति और प्रयास क्षणभंगुर है। यह चेतावनी यह है कि निर्बल-सी द्रष्टि से अपने भाग्य को अपने हाथों में समझना विनाश की ओर ले जाता है; नदीयों को अपने अधिकार समझना क्या यह कहां गया कि वे खुद उनका सर्जक हैं?
केंद्रीयार्थ
इस वाक्य में परमेश्वर यहोवा यह स्पष्ट कर रहा है कि मिस्र की सत्ता उसकी सुरक्षा नहीं है, बल्कि परमेश्वर का डंडा है। फ़िरौन और बड़े नगर का स्वघोषित “मेरी नदी मेरी निज की है” कहना यह विश्वास दर्शाता है कि वे अपनी शक्ति को अधिराजेय मानते हैं, पर परमेश्वर का दंड उन सभी के ऊपर है जिन्हें अपने सामर्थ्य को ईश्वर के समान मानना पड़ता है। मैंयुद्ध की नीति और नियत के बावजूद परमेश्वर का न्याय उच्चतम है और वह उन सभी के विरुद्ध है जो अपनी सत्ता के स्रोत को भूल जाते हैं।
मुख्य विषय
संबद्ध पार्श्व पाठ
1) यशायाह 37:20 और यिर्मयाह 27:5-7 में परमेश्वर की सत्ता पर जोर है कि वह ही पृथ्वी के हर राजा को स्थापित और उठाता है। यह संदर्भ दिखाते हैं कि कोई भी शक्ति सीमा से बाहर नहीं जब तक वह परमेश्वर की आज्ञा में रहती है।
2) दानियाल 4:17 में “कौन परमेश्वर की करुणा से ऊँचा” है के विचार से यह समझता है कि मानव की महत्ता परमेश्वर के विरुद्ध नहीं हो सकती।
3) यर्मियाह 25:9 में बाबुल के आक्रमण के संदर्भ में यह स्पष्ट किया गया है कि राष्ट्रों की सेनाओं का शासन परमेश्वर के हाथ में है।
व्यावहारिक चिंतन
हम अक्सर अपनी उपलब्धियों को अपने प्रयासों के परिणाम के रूप में देखते हैं। यह verses यह याद दिलाते हैं कि हमारी सुरक्षा परमेश्वर के हाथों में है, न किसी सत्ता के स्व-संस्तार में। यदि हम पहचान लें कि हमारी नदी-सी शक्तियाँ भी उसका उपहार हैं, तो अहंकार घटता है और दयालुता, सत्यनिष्ठा और न्याय की ओर हमारा कदम बढ़ता है। संस्थागत प्रभुत्व के पीछे छुपी कितनी भी मजबूती हो, उसे परमेश्वर के ढांचे में समझना सीखना चाहिए—ताकि हम गर्व से नहीं, विनय से जीवन चलाएं।
यथार्थ क्रॉस-रेफरेंस
• यशायाह 13:11 — परमेश्वर की न्यायिक करह से पृत्वी की शक्तियाँ थमती दिखती हैं।
• दानियाल 4:17 — पृथ्वी के राजाओं की नीति परमेश्वर के अनुसार ही निर्धारित होती है।
• यिर्मयाह 27:5-7 — परमेश्वर की आज्ञा से ही सभी राष्ट्र-राज्य संचलित होते हैं; उनसे बढ़कर कोई सत्ता नहीं।
संक्षिप्त सार
यहेजकेल 29:3 में परमेश्वर मिस्र के राजा फ़िरौन और उसका नगर-व्यवस्था को चेतावनी देता है कि उनकी शक्ति केवल उसकी अनुमति से है। मानव-लोक की भूमिकात्मक सत्ता का अहंकार क्षणभंगुर है; प्रभु की इच्छा के अनुसार ही सब कुछ संचालित होता है। इस विश्वास के साथ जीना सीखें कि हमारी सुरक्षा और दिशा परमेश्वर के हाथों में है।
उद्धरण नोट: न सिर्फ पाठ की गहराई, बल्कि समान विचारधारा के प्रकाशकों के शब्द भी इस commentary में समाहित किए गए हैं। यदि आप चाहेंगे तो मैं Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के स्पष्ट उद्धरणों के छोटे अंश दे सकता हूँ।