यिर्मयाह 18:13 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

“इस कारण प्रभु यहोवा यह कहता है, जाति-जाति से पूछ कि ऐसी बातें क्या कभी किसी के सुनने में आई है? इस्राएल की कुमारी ने जो काम किया है उसके सुनने से रोम-रोम खड़े हो जाते हैं।

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यिर्मयाह 18:13 पद-दर-पद बाइबल टीका

मुख्य निष्कर्ष

यिर्मयाह 18:13 में प्रभु यहोवा इस्राइल के लोगों के कर्मों के प्रति निंदनात्मक नजऱ से बोलते हैं: जाति-जाति से पूछ कि ऐसी बातें क्या कभी किसी के सुनने में आई हैं? इस्राएल की कुमारी के पाप-प्रवृत्ति के कारण परमेश्वर का न्याय और पाप की गम्भीरता स्पष्ट रूप से उजागर होती है। यहाँ एक कड़ा प्रमाण है कि वैध उपदेश और प्रहार से ही पाप की गहराई समझाई जा सकती है, ताकि यहूदियों की आत्म-ग्लानि और पश्चात्ताप संभव हो सके।

वाचन-संदर्भ एवं साहित्यिक संदर्भ

यह वचन यिर्मयाह की पुस्तक में यहोवा के द्वारा भविष्यवक्ता के माध्यम से दिया गया चेतावनी-पाठ है जहाँ परमेश्वर इस्राएल के सामाजिक-आर्थिक टूट-फूट और धार्मिक भ्रष्टाचार की गम्भीरता से देखते हैं। यिर्मयाह ने इस संदेश को एक कटाक्षात्मक प्रश्न के रूप में प्रस्तुत किया है ताकि लोग अपनी स्थिति को सचमुच समझें।

पौराणिक-भाष्य और theological significance

प्रभु का यह उद्घोष दो आयाम प्रस्तुत करता है: एक तो पाप का सार्वभौमिक और आक्रामक ढंग से फैलना, और दूसरे यह कि धार्मिक-आचार-व्यवस्था की आड़ में होने वाले अन्याय और बेमानी के प्रति चेतावनी कितनी आवश्यक है। यह संदेश यह दिखाता है कि परमेश्वर कर्तव्यनिष्ठ न्याय के साथ निष्ठाहीनता को भी मापते हैं और इसे “कुमारी” की कथा के रूपक से अधिक व्यापक सामाजिक-राज्यों पर लागू करते हैं।

cross-reference संकेत

  • यिर्मयाह 5:26-29: समाज में भ्रष्टाचार और न्याय की कमी के कारण परमेश्वर का शासन-न्याय स्पष्ट है। यह वचन रूपक को वास्तविक-कर्याशीलता की चेतावनी के रूप में reinforce करता है।
  • यिर्मयाह 22:13-17: न्याय और करुणा के अभाव में राज्य के पतन का उल्लेख, जो यहाँ आत्म-हत्या-निन्दा के साथ जुड़कर पाप की गहरी जड़ दिखाता है।
  • यशायाह 1:4-6: पाप की व्यापकता और आचरण-ह्रास की दृष्टि से समानता देता है, ताकि पाठक आंतरिक परिवर्तन को समझ सकें।

इन संदर्भों से स्पष्ट है कि पाप का फैलाव सामाजिक और धार्मिक संरचनाओं को चूर-चूर कर सकता है और परमेश्वर की दृष्टि में तादात्म्य के साथ परिवर्तन आवश्यक है।

चिंतन-प्रश्न

  • मैं अपनी प्रमुख कमियों और दोहरे आचरण के बारे में कितना सचेत हूँ?
  • क्या मैं अपने समाज में अन्याय और पाप की लहरों के प्रति चेतावनी दे रहा हूँ या केवल आत्म-स्वार्थ में डुबा हुआ हूँ?
  • कैसे मैं प्रार्थना और विश्वास के साथ परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ा सकता हूँ?

संक्षिप्त निष्कर्ष

यिर्मयाह 18:13 का संदेश यह है कि पाप की प्रकृति और उसका सामाजिक-धर्मिक प्रभाव गहन है, और परमेश्वर चाहें तो न केवल व्यक्तिगत हृदयों को, बल्कि समाज के ढाँचे को भी उद्धार-संदेश से बदले। यथास्थिति पर चुप रहना ही अपराध है; जागरण और पश्चात्ताप से ही पथ-परिवर्तन संभव है।

उद्धरण और संदर्भित टिप्पणियाँ

मिश्रित टिप्पणीकारों के पुराने साहित्य में इस प्रकार के पाठ पर सारगर्भित भाव-वाणी मिलती है। यदि आप चाहें, तो Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के स्वर-उद्धरणों के संगत टुकड़ों को सामने रखना संभव है—परन्तु यहाँ हमने मुख्य पाठ के अर्थ को हिंदी में एकीकृत किया है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

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