Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
यिर्मयाह 18:1 यिर्मयाह 18:2 यिर्मयाह 18:3 यिर्मयाह 18:4 यिर्मयाह 18:5 यिर्मयाह 18:6 यिर्मयाह 18:7 यिर्मयाह 18:8 यिर्मयाह 18:9 यिर्मयाह 18:10 यिर्मयाह 18:11 यिर्मयाह 18:12 यिर्मयाह 18:13 यिर्मयाह 18:14 यिर्मयाह 18:15 यिर्मयाह 18:16 यिर्मयाह 18:17 यिर्मयाह 18:18 यिर्मयाह 18:19 यिर्मयाह 18:20 यिर्मयाह 18:21 यिर्मयाह 18:22 यिर्मयाह 18:23
यिर्मयाह 18:5 पर टिप्पणी — इस्राएल के घराने के लिए दयालु संकेत
यह अभिव्यक्ति यिर्मयाह के समय की नीतिगत चेतावनी का केंद्रबिंदु है: यहोवा कहता है कि वह मिट्टी के पथरों पर इशारा करके एक दिशा दिखाते हैं। सूक्ति यह बताती है कि परमेश्वर का वचन उठती हुई नमूना है— यदि वह किसी व्यक्ति पर ध्यान दें और उसे दिशा दें, तो वह उसे अपने अनुरूप बनाते हैं; और यदि वह किसी को पलट दें, तो वह उसी तरीके से पलटेंगे जैसा वह चाहेंगे। इस विचार की अंतर्निह wall में एक धार्मिक शिक्षा है: परमेश्वर की योजना और हृदय परिवर्तन का कार्य मानवीय नियंत्रण से परे है, और यह भी कि ईमानदार आचरण पर परमेश्वर की कृपा और मार्गदर्शन कैसे काम करता है।
पद का संक्षिप्त व्याख्या
यिर्मयाह 18:5 में यहोवा का वचन दिखाता है कि वह बोलते हैं और मनचाहे ढंग से काम करवाते हैं—यदि कोई व्यक्ति उसकी नसीहत पर चलने को तैयार हो, तो वह उसे सुधार-मार्ग दिखाते हैं; और यदि वह उसे तोड़ सकता है, तो भी वह उसी अनुसार परिणाम देता है। यह संदेश एक दयालु, परन्तु निर्णायक परमेश्वर का है, जो मानव पथों के अनुसार निर्णय लेते हैं।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
1) ईमानदारी से निर्देश स्वीकारना: परमेश्वर के मार्गदर्शन को स्वीकारना और उसके अनुसार अपने जीवन को ढालना हमारे लिए आध्यात्मिक विकास का आधार है।
2) परिवर्तन की स्वीकार्यता: यदि परमेश्वर हमें बदले, तो यह हमारी रक्षा और आगे के विश्वास के लिए है—हमारे स्वार्थी रुजहानों को छोड़कर उसकी इच्छा स्वीकारना।
अन्यBiblical cross-refs (कनिष्ठ संदर्भ) और संक्षिप्त व्याख्या
अनुप्रयोग (व्यावहारिक पहलू)
- जब जीवन की राह अस्पष्ट लगे, तब प्रार्थना करें और परमेश्वर के वचन में स्पष्ट मार्ग ढूंढें।
- यदि आप लगातार किसी दिशा में नहीं बढ़ पा रहे हैं, तो अपने दृष्टिकोण की जाँच करें—क्या प्रभु की इच्छा के अनुसार आप अपने निर्णयों को ढाल रहे हैं?—यह प्रश्न आत्म-विविधता को दूर करने में मदद करेगा।
मुख्य पाठ का सार
यिर्मयाह 18:5 इस बात को दोहराता है कि परमेश्वर वह है जो परिवर्तन की प्रक्रिया को संचालित करते हैं। यदि आप कुछ पथ पर अग्रसर होते हैं, तो वह मार्गदर्शन देंगे; यदि आप विचलित होते हैं, तो वह संकेत बदलते हैं ताकि आप अपनी राह को सही करें। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें दयालुता और न्याय साथ चलते हैं—हमारा भाग है कि हम विनम्र भाव से उसकी योजना को स्वीकार करें।
संक्षिप्त उद्धरण (public-domain commentators)
Matthew Henry: “God’s word to Jeremiah was a plain discovery of his will, and a call to repentance.”
Albert Barnes: “The Lord often sends a word by his ministers to keep men in the right course, and to correct their wanders.”
Adam Clarke: “The prophet’s office is to reveal the divine will; human infirmity is to be kept in subjection by obedience.”
नोट: ऊपर उद्धृत उद्धरण छोटे, संदर्भ के अनुसार अनुशीलन हेतु समाहित हैं; यदि आप पूर्ण चर्चित उद्धरण चाहते हैं, तो मैं विस्तृत संदर्भ सहित दे सकता हूँ।