Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
यहोशू 18:1 यहोशू 18:2 यहोशू 18:3 यहोशू 18:4 यहोशू 18:5 यहोशू 18:6 यहोशू 18:7 यहोशू 18:8 यहोशू 18:9 यहोशू 18:10 यहोशू 18:11 यहोशू 18:12 यहोशू 18:13 यहोशू 18:14 यहोशू 18:15 यहोशू 18:16 यहोशू 18:17 यहोशू 18:18 यहोशू 18:19 यहोशू 18:20 यहोशू 18:21 यहोशू 18:22 यहोशू 18:23 यहोशू 18:24 यहोशू 18:25 यहोशू 18:26 यहोशू 18:27 यहोशू 18:28



यहोशू 18:16 — हिंदी स्पष्टार्थ
इस पद का प्राथमिक अर्थ है: यह पहाड़ के किनारे की भौगोलिक स्थिति बताता है—यबूस के दक्षिण की तराई और हिन्नोम के तराई के सामने स्थित एक ऊँचा भाग, जहाँ यहोशू ने पड़ाव डाला और फिर प्रकरण के अनुसार भागभूमि के दायरे के विभाजन की योजना बनाई।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यहोशू ने फिरऔन-याज के बाद इब्रानी ठिकानों के विभाजन की प्रक्रिया जारी रखी। इसVERSE में यह बतलाया गया है कि किस पहाड़ी या तराई क्षेत्र से किस दिशा में यात्रा कर हिन्नोम, यहूदाय के नीचे आने वाले क्षेत्र, एनरोगेल और यबूस के निकट स्थित स्थानों की पहचान की गई है। यह संदर्भ ऐतिहासिक भूगोल की सूक्ष्म जानकारी देता है ताकि आदमी यह समझ सके कि किस रास्ते पर यहोशू और उसकी सेना आगे बढ़ी होगी और कब कब नगरों के दायरे तय किए गए।
चर्चित विश्लेषण
- भूगोल की सटीकता: पहाड़ के सिरे और तराई की दिशा योग्यता से मिलती-जुलती है, ताकि यह स्पष्ट हो कि यहोशू किस मार्ग से आगे बढ़े और किन नगरों के निकट पहुँचे।
- नगरों की पहचान: हिन्नोम के तराई, रापा तराई, एनरोगेल और यबूस दक्षिणी ओर—इन नामों के साथ क्षेत्रीय विभाजन और बाहरी चोटों के रणनीतिक महत्व का संकेत मिलता है।
- विभाजन की प्रक्रिया: यहोशू ने प्रदेश की सीमाओं की पहचान और उनके भीतर रहने वालों के लिए निर्धारित क्षेत्र का क्रम रखा, जो बाद की वचनों में यहूदियों के वास-स्थान की संरचना बनाता है।
संरचना-आत्म समीक्षा (मुख्य विचार)
अनुबंधित cross-references (संक्षेप में)
1) यहोशू 15:5 — यहूदा के भूभाग की परिधियाँ समझाने में साथ देता है कि तराई और पहाड़ी क्षेत्रों का संयोजन कैसे निर्णयों में आता है।
2) यहोशू 18:11-15 — वास-उत्तरी नगरों के क्रम के बारे में एक विस्तृत अनुक्रम देता है, जिससे इस verse के भूगोलिक क्रम की समझ गहरी होती है।
3) यशायाह 2:2-3 जैसे भूगोल-आधार पर शहरों के महत्व के संकेत, एक संदर्भ के रूप में देखने लायक हैं।
व्यावहारिक निष्कर्ष
इस पद से सीख मिलती है कि आस्तीन-चीन्हे हुए स्थानों की जानकारी और भूगोल को समझना वर्गीकरण के लिए आवश्यक है। जब राजनीतिक-युद्ध या नदी-मार्ग की योजना बनानी हो, तो क्षेत्रीय पहचान की स्पष्टता निर्णायक होती है।
ध्यान दें: इस commentary में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सीधे उद्धरण आवश्यकतानुसार संकेतित हैं; यदि उपलब्ध हों, वे संक्षेप में नीचे उद्धृत हो सकते हैं.