Old Testament
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लूका 6:1 लूका 6:2 लूका 6:3 लूका 6:4 लूका 6:5 लूका 6:6 लूका 6:7 लूका 6:8 लूका 6:9 लूका 6:10 लूका 6:11 लूका 6:12 लूका 6:13 लूका 6:14 लूका 6:15 लूका 6:16 लूका 6:17 लूका 6:18 लूका 6:19 लूका 6:20 लूका 6:21 लूका 6:22 लूका 6:23 लूका 6:24 लूका 6:25 लूका 6:26 लूका 6:27 लूका 6:28 लूका 6:29 लूका 6:30 लूका 6:31 लूका 6:32 लूका 6:33 लूका 6:34 लूका 6:35 लूका 6:36 लूका 6:37 लूका 6:38 लूका 6:39 लूका 6:40 लूका 6:41 लूका 6:42 लूका 6:43 लूका 6:44 लूका 6:45 लूका 6:46 लूका 6:47 लूका 6:48 लूका 6:49



लूका 6:29 का inmediato सेटिंग और विचार
यह पाठ यूँ कहता है कि जो तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे, उसको दूसरे गाल की ओर भी फेर दो; और जो तेरी चोही तेरे कपड़े से उड़ा ले, उसको कुर्ता लेने से भी न रोक। यह उद्धारक यीशु का वास्तविक व्यवहार-प्रश्न है—कठोर दंडनीयता के बजाय प्रेम और धैर्य का मार्ग दिखाने वाला। यहाँ Jesus अपने शिष्यों को प्रतिशोध के चक्र से ऊपर उठकर, प्यार के प्रतीक बनने के लिए बुलाते हैं। यह सेटिंग बताती है कि हृदय परिवर्तन से ही समाज परिवर्तन शुरू होता है।
ईश्वर या 믿 faith के बारे में यह टेक्स्ट क्या उजागर करता है
यह संदेश दिखाता है कि ईश्वर का राज्य प्रतिशोधपूर्ण सत्ता पर नहीं, बल्कि क्षमा और अनुग्रह पर चलता है। विश्वास-जीवन में वास्तविक शक्ती मूक शक्ति, सहनशीलता और माफ करने की क्षमता में है। यह प्रेम के सामने प्रतिशोध का ऊँचा मूल्य है—स्वतः की सुरक्षा को नहीं, बल्कि दूसरे की गरिमा को बनाए रखना।
मुख्य शब्दों की व्याख्या
अन्य प्रासंगिक पद
यहाँ के संदेश से जुड़े कुछ संदर्भ दिखते हैं:
इतिहासिक-आध्यात्मिक संदर्भ से संकल्प
प्राचीन नियमों में भी बदला लेने की प्रवृत्ति आम थी; यीशु ने इसे चुनौती दी और नए नैतिक ढांचे की स्थापना की। यह पाठ प्रेरित-जीवन की प्रेरक धारा बनता है: प्रतिशोध की बौछार के बजाय करुणा और आसपास के लोगों के कल्याण पर केंद्रित प्रेम।
आज के संदर्भ में व्यवहारिक अनुप्रयोग
हमें यह सीख देता है कि आक्रामक परिस्थितियों में भी आत्म-नियंत्रण बनाए रखें, सहयोग-भाव से काम लें और दूसरे की गरिमा बनाए रखें। यह प्रतिशोध के बजाय जिम्मेदारी, शांति और शुद्ध आचरण की राह है—परिवार, workplace और समाज में भी यही मार्ग अधिक प्रभावी और जीवन-सम्मत है।
संक्षिप्त समेकन
इस पाठ में यीशु शक्ति के असली स्रोत के रूप में प्रेम, धैर्य और क्षमा का मार्ग दिखाते हैं। प्रभु का लक्ष्य है कि हमारे उत्तर में भी ईश्वरीय करुणा झलकती रहे, ताकि द्वेष के चक्र टूट कर प्रेम के समाज का निर्माण हो सके।
संदर्भ-स्त्रोत से एक-दो उद्धरण (सार):
Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डायवन उद्धरण यदि उपलब्ध हों तो संक्षेप में विचारित हैं; नीचे पूर्ण पाठ नहीं दिया गया है, केवल उनके विचारों का सार दिया गया है।