Old Testament
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लूका 6:1 लूका 6:2 लूका 6:3 लूका 6:4 लूका 6:5 लूका 6:6 लूका 6:7 लूका 6:8 लूका 6:9 लूका 6:10 लूका 6:11 लूका 6:12 लूका 6:13 लूका 6:14 लूका 6:15 लूका 6:16 लूका 6:17 लूका 6:18 लूका 6:19 लूका 6:20 लूका 6:21 लूका 6:22 लूका 6:23 लूका 6:24 लूका 6:25 लूका 6:26 लूका 6:27 लूका 6:28 लूका 6:29 लूका 6:30 लूका 6:31 लूका 6:32 लूका 6:33 लूका 6:34 लूका 6:35 लूका 6:36 लूका 6:37 लूका 6:38 लूका 6:39 लूका 6:40 लूका 6:41 लूका 6:42 लूका 6:43 लूका 6:44 लूका 6:45 लूका 6:46 लूका 6:47 लूका 6:48 लूका 6:49



लूका 6:21 का संदर्भ और अर्थ
यह पद लूका के बीच के शिक्षा-संहिता (आशीर्वचन) के क्रम में आता है, जहां यीशु अपने अनुयायियों को आंतरिक खुशी और लालच-रहित धैर्य की महिमा बतलाते हैं। मृत-जीवन के सुखों के बजाय, वे भौतिक कमी और दुख के समय में भी ईश्वर की कृपा पर भरोसा करने की शिक्षा देते हैं। इस वक्तव्य में ग़रीबी-आर्थिक स्थिति और आंसुओं के बीच भी भविष्य की संतुष्टि और आनंद की आशा व्यक्त है।
मुख्य अर्थ
यह वचन उन लोगों के लिए है जो इस समय भूखे, रोते या पीड़ित हैं—परन्तु भविष्य में उन्हें तृप्ति, आनंद और हंसी प्राप्त होगी। यह गवाही देता है कि ईश्वर का राज्य उन परिस्थितियों में भी आशा देता है जहाँ मानव-आशा टूट सकती है। इस प्रकार, ईश्वर के राज्य के दृष्टिकोण से हालात कैसे भी हों, अंततः अनुग्रह और पूर्ण तृप्ति वहाँ होगी।
कुंजी विषय
अन्य सन्दर्भ और उनका संक्षेप आकर्षण
• मत्ती 5:4–5— वही विचार, पर अधिक विस्तृत प्रतिज्ञा: आंसुओं और दासता के बाद उद्धार का सत्य।
• भजन 126:5–6— पूर्व-विरह के समय मानवीय धैर्य का परिणाम: रोना-क्रंदन के समय भी भविष्य की खुशी का निदान दिखता है।
गंभीर शैली में तात्पर्य
जो अब भूखे हैं, वे प्रभु के राज्य में पूरी तृप्ति की आशा करें। जो अब रोते हैं, वे भविष्य के आनंद से सपनों को पुनः जगा लें। यह केवल एक नैतिक शिक्षा नहीं, बल्कि ईश्वर-राज्य की प्रकृति का उद्घाटन है: विपरीत परिस्थितियाँ भी उसकी कृपा के पूर्ण प्रकट होने के क्षण बन सकती हैं।
व्यावहारिक विचार
पक्के उद्धरण-उद्धरण (संश्लेषित)
यह अनुभूति Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डायम के विचारों से प्रेरित है। उनके अनुसार इस दुआ-भिन्न अवस्था में भी आशीर्वाद की गूंज-सी है—भविष्य की खुशी यहाँ के दुखों के बाद है।
छोटे क्रॉस-रेफरेंसेस
• मत्ती 5:4–5 के साथ एक संगत पुल: आंसुओं और भूख के समय पिता की कृपा से उद्धार का पथ खुलता है।
• भज 126:5–6: रोने के समय भी परिवर्तन-रूपी आनंद की आशा बनी रहती है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यही शिष्य-जीवन की ध्वनि है: अस्वस्थ स्थिति के बावजूद ईश्वर की राज्य-योजना की पुष्टि। भूख-रोह के बीच भी भविष्य में पूर्ण तृप्ति और आनंद की संभावना बनी रहती है। यह शास्त्री विचार नहीं, बल्कि जीवित विश्वास की वास्तविकता है कि प्रभु के राज्य में दुख के समय भी जीवित आशा है।